तुर्की के बढ़ते प्रभाव से क्या इस्राईल वाक़ई में चिंतित है?
क्षेत्र में तुर्की के बढ़ते प्रभाव से ज़ायोनी शासन और उसकी सेना गहरी चिंता में है।
तुर्की भूमध्य सागर से लाल सागर और हिंद महासागर तक अपने राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सैन्य हितों का विस्तार कर रहा है, जो इस्राईल और उसके सहयोगियों साइप्रस, ग्रीस, मिस्र, सऊदी अरब, संयुक्त अरब इमारात और तथा लीबिया में जनरल ख़लीफ़ा हफ़्तर की चिंता का प्रमुख विषय है।
अंकारा ने ग़ज़्ज़ा पट्टी, अवैध अधिकृत पूर्वी बैतुल मुक़द्दस, सोमालिया और लीबिया में अपनी उपस्थिति में वृद्धि की है और हालिया दिनों में उसने यमन में भी अपनी दिलचस्पी दिखानी शुरू की है।

फ़्रांसीसी अख़बार इंटेलिजेंस ऑनलाइन का कहना है कि तुर्क ख़ुफिया एजेंसी एमआईटी ने यमन की इसलाह पार्टी के साथ अपने संबंध मज़बूत बनाए हैं।
वर्षों तक हौसियों से लड़ने वाले इस संगठन को सऊदी प्रॉक्सी होने के बावजूद, तुर्की के साथ सहयोग करने में कोई हिचक नहीं है।
तुर्की के हितों के विस्तार में आईएचएच राहत और मानवीय समूह की अहम भूमिका है।
2010 में यह समूह उस समय चर्चा में आया था, जब उसने मावी मरमरा नामक जहाज़ में ग़ज्ज़ा पट्टी के लिए मानवीय सहायता भेजी थी, जिसमें तुर्की और कई अन्य देशों के सामाजिक कार्यकर्ता सवार थे। इस्राईली नैवी ने इस जहाज़ पर हमला कर दिया था, जिसके नतीजे में तुर्की के 10 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी।
तीन साल बाद, ज़ायोनी शासन के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने 2 करोड़ 10 लाख डॉलर का हर्जाना अदा करते हुए तुर्की के तत्कालीन प्रधान मंत्री रजब तैयब अर्दोगान से माफ़ी मांगी थी।
नेतनयाहू और ज़ायोनी सेना प्रमुख का मानना था कि उनके इस क़दम से एक बार फिर इस्राईल और तुर्की के रिश्ते दोस्ताना हो जायेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

दोनों पक्षों के बीच, व्यापक आर्थिक सहयोग के बावजूद, ख़ुफ़िया और रक्षा सहयोग अपने सबसे निचले स्तर पर है।
इससे पहले तुर्की और इस्राईल के बीच, पिछले 50 वर्षों से ख़ुफ़िया और रक्षा सहयोग जारी था, तुर्क ख़ुफ़िया एजेंसी एमआईटी और इस्राईली जासूसी एजेंसी मोसाद के प्रमुख निरंतर मुलाक़ात करते थे और दोनों एजेंसियों के बीच ख़ुफ़िया सूचनाओं का आदान प्रदान होता था।
तुर्की इस्राईली हथियारों का एक बड़ा ख़रीदार था। 1985 से 2000 तक तुर्की ने ज़ायोनी शासन से 5 अरब डॉलर के टैंक, मिसाइल, ड्रोन और अन्य हथियार ख़रीदे थे।
लेकिन पिछले एक दशक के दौरान, जब से तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान ने सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत की है, अंकारा ने तेल-अवीव से दूरी बनानी शुरू कर दी।
इस्राईली अधिकारियों को ज़ायोनी शासन के फ़िलिस्तीनियों पर अत्याचार और उसके अतिक्रमण के बारे में अर्दोगान के शाब्दिक हमलों से कोई ख़ास परेशानी नहीं है। उसकी मुख्य चिंता, तुर्की द्वारा फ़िलिस्तीन के इस्लमी प्रतिरोधी संगठन हमास की सैन्य शाख़ा और तुर्की के बीच सहयोग से है।
हालांकि इस्राईल, अमरीका के माध्यम से एक बार फिर अर्दोगान शासन को शीशे में उतारने की भरपूर कोशिश कर रहा है और उसके साथ हर स्तर पर सहयोग बढ़ाना चाहता है।
यहां देखना यह होगा कि ख़ुद को इस्लामवादी कहलाने वाले अर्दोगान, फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों के प्रति कितने निष्ठावान हैं और इस्राईल के अत्याचारों के ख़िलाफ़ ज़बानी जमा ख़र्च के अलावा भी वे खुलकर कोई व्यवहारिक क़दम उठाते हैं या नहीं। msm