क्या सऊदी अरब परमाणु जाल में फंसने जा रहा है?
जब भी कोई देश परमाणु ऊर्जा हासिल करने की बात करता है तो भंवें तन जाती हैं। और यह उन देशों की ओर से होता है, जिनके पास बड़ी मात्रा में परमाणु हथियार हैं।
यह बात आसानी से समझ में आने वाली है कि परमाणु अप्रसार में मानवता की भलाई है। लेकिन शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु तकनीक में भेदभाव, विश्व समुदाय को अंसतुलित कर रहा है।
आजकल अरब प्रायद्वीप के बारे में ऐसी ही चिंताएं ज़ाहिर की जा रही हैं, क्योंकि संयुक्त अरब इमारात ने अरब जगत के पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्र बराकाह के चार रिएक्टरों में से पहले रिएक्टर में फ़्यूल इंजेक्ट कर दिया है।
इससे क़रीब 388 किलोमीटर के फ़ासले पर सऊदी अरब किंग अब्दुल अज़ीज़ सिटी में अपने पहले शोध रिएक्टर का निर्माण कर रहा है।
यूएई इस बात पर राज़ी हो गया था कि वह यूरेनियम का संवर्धन नहीं करेगा और इस्तेमाल शुदा ईंधन को रीप्रोसेस नहीं करेगा। उसने अप्रसार प्रोटोकॉल पर भी हस्ताक्षर किए हैं और यहां तक कि अमरीका के साथ 123 समझौता किया है।
यूएई की तरह सऊदी अरब अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को नागरिक ऊर्जा परियोजनाओं के तहत आगे बढ़ा रहा है। लेकिन अपने पड़ोसी और क्षेत्रीय देशों के विपरीत, रियाज़ ने आधिकारिक रूप से परमाणु हथियार विकसित नहीं करने का कोई वादा नहीं किया है।
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान खुलेआम यह एलान कर चुके हैं कि अगर ईरान, परमाणु हथियार हासिल करता है तो सऊदी अरब ज़रूर परमाणु बम बनाएगा।
सऊदी अरब की परमाणु महत्वाकांक्षाओं का इतिहास, ज़्यादा पुराना नहीं है। 2006 में जीसीसी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर सऊदी अरब ने परमाणु ऊर्जा प्राप्त करने का विकल्प सामने रखा था।
हाल ही में बिन सलमान ने देश की अर्थव्यवस्था की निर्भरता को तेल पर कम करने के लिए पेश किए गए विजन 2030 के तहत अपनी परमाणु योजनाओं को आगे बढ़ाने पर बल दिया था।
सऊदी अरब ने दो परमाणु बिजली घर बनाने के लिए कंपनियों को आमंत्रित किया था, लेकिन अभी तक किसी भी कंपनी को ठेका नहीं दिया गया है।
ब्लूमबर्ग न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, मार्च और मई में ली गई सेटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि सऊदियों ने एक रिएक्टर के ऊपर छत का निर्माण कर लिया है। परमाणु विशेषज्ञों ने इस बारे में चेतावनी दी है, क्योंकि रियाज़ ने अभी तक अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए को अपने रिएक्टर की निगरानी के लिए आमंत्रित नहीं किया है।
सऊदी अरब ने परमाणु हथियारों के अप्रसार की संधी (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन इससे आईएईए निरीक्षकों को जब भी और जहां कहीं भी वे चाहेंगे, निरीक्षक की आज़ादी नहीं मिलती है।
इसकी इजाज़त सिर्फ़ उसी समय दी जाती है, जब कोई देश आईएईए के साथ अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करता है, जैसा कि ईरान या यूएई ने किया है, लेकिन सउदी अरब ने ऐसा नहीं किया है।
रियाज़ ने वाशिंगटन के साथ 123 समझौता भी नहीं किया है, जिससे दोनों देशों को द्विपक्षीय शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग का अवसर मिल सके।
123 समझौते से अमरीकी परमाणु कंपनियों को सऊदी अरब में मोटा पैसा कमाने का मौक़ा मिल जाएगा।
कहा यह जा रहा है कि इस समझौते के रास्ते में एक बड़ी रुकावट, यूरेनियम के संवर्धन या प्लूटोनियम को फिर से तैयार करने पर सहमति का नहीं बन पाना है, जो परमाणु हथियार बनाने के लिए के लिए एक प्रमुख तत्व है।
क्षेत्र में ज़ायोनी शासन एकमात्र ऐसा शासन है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं और अमरीका तथा उसके पश्चिमी सहयोगियों ने उसकी ओर से आंखें मूंद रखी हैं।
इस्राईल ने एनपीटी पर भी हस्ताक्षर नहीं किए हैं और न ही वह आईएईए के निरीक्षकों को निरक्षण की अनुमति देता है।
2018 में सीबीएस को इंटरव्यू देते हुए सऊदी क्राउन प्रिंस ने दावा किया था कि इसमें कोई शक नहीं है कि अगर ईरान ने परमाणु बम बनाया, तो जितने जल्द हो सकेगा हम भी ऐसा ही करेंगे।
इसमें कोई शक नहीं है कि अमरीका, सऊदी शासकों को परमाणु हथियार हासिल करने के लिए उकसा रहा है, ताकि इस देश पर अपने पंजे और मज़बूत कर सके और जब चाहे उस पर कड़े प्रतिबंध लगाकर, आर्थिक रूप से उसे तबाह कर दे। msm