मध्यपूर्व की स्थिति कैसी रही और आगे कैसी रहेगी?
मध्यपूर्व के बारे में राजनीतिक मामलों के जानकार कह रहे हैं कि इस क्षेत्र के बारे में कोई भी फ़ैसला ईरान की भागीदारी के बिना व्यवहारिक हो ही नहीं सकता।
सन 2020 में मध्यपूर्व में विदेशी हस्तक्षेप अधिक रहा। इस वर्ष के दौरान अमरीका ने मध्यपूर्व के परिवर्तनों में ज़्यादा भूमिका निभाई। वाशिंगटन पिछले तीन दशकों से मध्यपूर्व के हर छोटे-बड़े मामलों में हस्तक्षेप करता रहा है।
गुज़रे हुए इस वर्ष का आरंभ जनरल क़ासिम सुलैमानी की शहादत से हुआ था। ट्रम्प ने जनरल क़ासिम सुलैमानी की हत्या में अपनी भूमिका को स्वीकार किया था। इसी के साथ कुछ अरब शासकों ने इसी वर्ष के अन्तिम महीनों में अवैध ज़ायोनी शासन के साथ अपने संबन्धों को सामान्य किया। दोनो घटनाएं, क्षेत्र में अमरीकी उपस्थिति की परिचायक हैं। पश्चिमी एशिया में अमरीका के लगातार हस्तक्षेप का मुख्य कारण यह है कि क्षेत्र के समीकरणों को ज़ायोनी शासन के हित में मोड़कर उसकी सुरक्षा को सुनिश्चित बनाया जाए और प्रतिरोध के मोर्चे को यथासंभव कमज़ोर बनाकर समाप्त कर दिया जाए क्योंकि इस्राईल, हमेशा के लिए हिज़्बुल्लाह से छुटकारा पाना चाहता है जो उसे मिलता दिखाई नहीं दे रहा है। अमरीका के ब्रूकिंग्स इन्सटीट्यूट ने भी यह बात स्पष्ट की है कि मध्यपूर्व में अमरीकी सैनिकों की उपस्थिति, ज़ायोनी शासन और उसके हितों की सुरक्षा के लिए ही है। लेकिन यह बात समझनी बहुत ज़रूरी है कि मध्यपूर्व के बारे में कोई भी फ़ैसला ईरान की भागीदारी के बिना व्यवहारिक हो ही नहीं सकता।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मध्यपूर्व ने अस्थिर और तनावपूर्ण हालत में 2020 को गुज़ारा। जानकारों का कहना है कि क्षेत्र की परिस्थितियों को देखते हुए एसा लगता है कि आने वाला साल, मध्यपूर्व के लिए शुभ सिद्ध होगा। टीकाकारों का कहना है कि अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की पराजय, मध्यपूर्व में शांति एवं स्थिरता के प्रति आशावान होने का कारण बनी है।