पहला क़दम कौन बढ़ाएगा? तेहरान या वाशिंग्टन? अलजज़ीरा की रोचक रिपोर्ट
गत तीन बरसों में ईरान व अमरीका के बीच तनाव अपने चरम तक पहुंच गया यहां तक कि सैन्य टकराव तक की बातें होने लगी थीं लेकिन ट्रम्प के साथ ही युद्ध का खतरा भी चला गया किंतु अब सवाल यह है कि बाइडन के आने के बाद पहल कौन करेगा? ईरान या अमरीका? अलजज़ीरा टीवी चैनल ने अपनी एक रिपोर्ट में इसी सवाल का जायज़ा लिया है।
अलजज़ीरा ने लिखा है कि ईरानी मूल के अमरीकी अध्ययनकर्ता अली अकबर दारीनी का कहना है कि तेहरान किसी भी दशा में इस बात का लंबा इंतेज़ार नहीं करेगा कि अमरीका परमाणु समझौते में वापसी के लिए पहला क़दम कब उठाता है।
उन्होंने एक इन्टरव्यू में कहा है कि अगर बाइडन सरकार, परमाणु समझौते से निकलने के ट्रम्प के फैसले से होने वाले नुक़सान की भरपाई नहीं करती तो ईरान अधिक मात्रा में यूरेनियम का संवर्धन जारी रखेगा।
याद रहे कि ट्रम्प सरकार ने लगभग तीन बरस पहले ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से निकलने का एलान किया था और उसके बाद ईरान के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये थे। उसके जवाब में ईरान ने यूरेनियम का संवर्धन बढ़ा दिया यहां तक कि हालिया दिनों में इस्राईल ने दावा किया कि ईरान, परमाणु बम के निकट है।
इस से पहले बाइडन, परमाणु समझौते से निकलने की वजह से ट्रम्प की तीखी आलोचना कर चुके हैं और उनके अनुसार अगर तेहरान परमाणु बम बनाता है तो इसकी ज़िम्मेदारी ट्रम्प पर होगी लेकिन इसके बावजूद बाइडन ने परमाणु समझौते में वापसी के लिए यह शर्त रखी है कि तेहरान पहला क़दम उठाए और यूरेनियम का संवर्धन पुरानी मात्रा और प्रतिशत में करना शुरु कर दे।

दारीनी का कहना है कि तेहरान, बाइडन के रुख से निराश है और वह चाहता है कि पहला क़दम अमरीका की ओर से उठाया जाए क्योंकि समझौते से अमरीका निकला है, ईरान नहीं।
उनके अनुसार, बाइडन की सरकार में एक धड़ा, परमाणु समझौते में अमरीका की बिना शर्त वापसी का इच्छुक है लेकिन एक अन्य धड़ा भी है जो यह चाहता है कि अमरीका कुछ नयी शर्तों के साथ समझौते में वापसी करे। इस लिए अगर अमरीका ने अपनी वापसी के लिए एसी शर्त रखी जिसका परमाणु समझौते से कोई संबंध नहीं होगी तो उसे किसी भी दशा में सफलता नहीं मिलने वाली है।
तेहरान, परमाणु समझौते के लिए होने वाली वार्ता में नये पक्षों की भागीदारी का विरोधी है और वह बल देता है कि परमाणु समझौते का मामला, क्षेत्रीय स्तर पर वार्ताओं से अलग है। इसके साथ ही ईरान , अमरीका के बिना, क्षेत्रीय मामलों में क्षेत्रीय देशों को वार्ता का निमंत्रण भी देता है।
दूसरी तरफ क्विंसी स्टडी सेन्टर के प्रसिद्ध शोधकर्ता जोज़फ सिरीन्स्यूनी कहते हैं कि बाइडन ईरान के साथ परमाणु समझौते में वापसी करेंगे और इस समय वह इस समझौते के पालन के लिए वापसी के सही तरीक़े पर गौर कर रहे हैं। उनका कहना है कि ईरानियों को यह अधिकार है कि वह कामों पर ध्यान दें, बातों पर नहीं। उनका मानना है कि अमरीका अगले दो हफ्तों में परमाणु समझौते में वापसी के लिए कुछ क़दम उठाएगा।
वह कहते हैं कि बाइडन की सरकार ने ईरान के खिलाफ लगे प्रतिबंधों विशेषकर सहायता के क्षेत्र में प्रतिबंधों को खत्म करने पर विचार शुरु कर चुकी है और अमरीका उन सभी प्रतिबंधों को हटाने पर विचार कर रहा है जो कोरोना से मुकाबले के लिए ज़रूरी चीज़ों के निर्यात में रुकावट बन रही है इस लिए यह महसूस हो रहा है कि बाइडन सरकार अपनी सदभावना प्रकट करने के लिए ईरान के खिलाफ कुछ प्रतिबंध खत्म कर देगी।
उनका कहना है कि दोनों देशों को एसा कुछ करना चाहिए जिससे अमरीका के प्रतिबंधों का अंत और ईरान द्वारा अपने वचनों के पालन की तरफ वापसी एक साथ हो क्योंकि दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाली का यही एक मात्र मार्ग है। यह एसी दशा में है कि जब ईरान के मामले में अमरीका के विशेष अधिकारी ने वाशिंग्टन के युरोपीय घटकों से संपर्क साधना शुरु कर दिया है और उनकी कोशिश है कि रूस सऊदी अरब और इलाक़े के अन्य देशों के साथ भी संपर्क बनाएं।
कुछ अरब सरकारों की इच्छा है कि ईरान के साथ होने वाली परमाणु वार्ता में वह भी शामिल हों लेकिन अलजज़ीरा से एक वार्ता में ईरानी संसद में विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रवक्ता अबुलफज़्ल अमूई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ईरान, अपने पड़ोसियों से बातचीत करेगा, लेकिन अमरीका के साथ नहीं, क्षेत्रीय मुद्दे अलग हैं और परमाणु समझौते अलग। Q.A.
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