ग़ज़्ज़ा का ऐतिहासिक पाठः "घेराव में आने वाले ही जीतेंगे।"
राष्ट्रों को झुकाने के लिए अमरीका की विदेश नीति की सबसे अहम चाल उन्हें भूखा रखने का पाश्विक व अमानवीय हथकंडा है और ट्रम्प सरकार में यह चाल ऐतिहासिक चरण में पहुंच गई थी और ऐसा लगता है कि बाइडन की सरकार भी इसी चाल को आगे बढ़ा रही है।
राष्ट्रों को भूखा रख कर उनके जनसंहार की अमरीका की नीति का मुख्य लक्ष्य, इस्राईल के हितों का बचाव है और ये हित फ़िलिस्तीनी राष्ट्र पर हमले, उसकी ज़मीनों पर अवैध क़ब्ज़े और फ़िलिस्तीनियों को बेघर करने पर आधारित हैं। वर्ष 2006 में संसदीय चुनाव में फ़िलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोध संगठन हमास की जीत और फिर सन 2015 से यमन के युद्ध और यमनी राष्ट्र के घेराव के बाद यह नीति अधिक पाश्विक ढंग से आगे बढ़ाई गई और इसी परिप्रेक्ष्य में हिज़्बुल्लाह, अंसारुल्लाह, इराक़ी स्वयं सेवी बल और कुछ अन्य प्रतिरोधकर्ता गुटों को अमरीका की आतंकी गुटों की लिस्ट में शामिल कर दिया गया।
ध्यान योग्य बात यह है कि अधिकतर देश अमरीकी प्रतिबंधों से डर की वजह से अमरीका की इस शत्रुतापूर्ण नीति के सामने झुक गए हैं जिनमें तेल पैदा करने वाले अरब रजवाड़े सबसे आगे आगे हैं अलबत्ता उनका यह काम अमरीका के दबाव या उससे डर की वजह से नहीं है बल्कि इन सरकारों को दी गई ज़िम्मेदारी को अदा करने के लिए है। यही वजह है कि हम देखते हैं कि सऊदी अरब, यूएई और बहरैन जैसे अरब देश, प्रतिरोध के समर्थक हर शख़्स के पीछे पड़ जाते हैं चाहे वह प्रतिरोध का नैतिक समर्थन ही क्यों न कर रहा हो।
अमरीका, पश्चिमी देश, इस्राईल और सांठ-गांठ करने वाले रुढ़िवादी अरब देशों का मानना है कि राष्ट्रों को भूखा रख कर, उन पर प्रतिबंध लगा कर और उनका घेराव करके वे अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं लेकिन इन दिनों ग़ज़्ज़ा में प्रतिरोधकर्ता गुटों ने जिस बेजोड़ साहस का प्रदर्शन किया है और पूरे अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में राॅकेटों व मीज़ाइलों की बारिश करके 60 लाख से ज़्यादा ज़ायोनियों की नींद उड़ा दी है और इस्राईल के सभी हवाई अड्डों को बंद करा दिया है, उसने फ़िलिस्तीन के मामले को ख़त्म कराने की हर प्रकार की चाल और साज़िश को शुरू होने से पहले ही विफल बना दिया है।
मीज़ाइल व मीज़ाइल टेकनाॅलोजी, जिसकी छाया में प्रतिरोध ने ध्यान योग्य कामयाबियां हासिल की हैं, घेराव में आए हुए ईरान और घेराव किए गए हिज़्बुल्लाह के माध्यम से ही घेराबंदी में मौजूद ग़ज़्ज़ा तक पहुंची है। आज ग़ज़्ज़ा "घेराव में आने वाले इस तरह जीतते हैं" के शीर्षक से दुनिया के सभी राष्ट्रों को ऐतिहासिक पाठ दे रहा है और उसने व्यवहारिक रूप से साबित किया है कि घेराबंदी से अमरीका के साम्राज्यवाद और ज़ायोनी शासन के हमलों के ख़िलाफ़ अपने बचाव व प्रतिरक्षा के राष्ट्रों के संकल्प को कमज़ोर नहीं करता बल्कि इसके विपरीत वे पहले से ज़्यादा दृढ़ संकल्पित हो जाते हैं, बस शर्त यह है कि ये राष्ट्र आत्म विश्वास रखें और हर चीज़ से पहले ईश्वर पर भरोसा करें। (HN)
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