नेतनयाहू के लिए चौतरफ़ा हार वाली जंग!
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ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री ताक़त की वजह से युद्ध विराम स्वीकार नहीं कर रहे हैं बल्कि इसके ठीक विपरीत संघर्ष विराम उनके लिए पराजय स्वीकार करने के बराबर है लेकिन समस्या यह है कि राह के अंत में उसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है और जंग जारी रहने और उसके अधिक व्यापक होने का नतीजा, नेतनयाहू के लिए अधिक नुक़सानदायक होगा।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
May १८, २०२१ १५:४२ Asia/Kolkata
  • नेतनयाहू के लिए चौतरफ़ा हार वाली जंग!

ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री ताक़त की वजह से युद्ध विराम स्वीकार नहीं कर रहे हैं बल्कि इसके ठीक विपरीत संघर्ष विराम उनके लिए पराजय स्वीकार करने के बराबर है लेकिन समस्या यह है कि राह के अंत में उसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है और जंग जारी रहने और उसके अधिक व्यापक होने का नतीजा, नेतनयाहू के लिए अधिक नुक़सानदायक होगा।

जब नेतनयाहू ने चरमपंथी ज़ायोनियों को मस्जिदुल अक़सा पर हमले और शैख़ जर्राह मुहल्ले के फ़िलिस्तीनियों को ज़बरदस्ती उनके घरों से निकालने के लिए उकसाया था ताकि इसके कारण पैदा होने वाले माहौल के माध्यम से अपने प्रतिस्पर्धी को सरकार गठन से रोक सकें तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि वे ऐसे संकट में फंस जाएंगे कि उनके पास न आगे बढ़ने का रास्ता होगा न पीछे हटने का।

अब अगर नेतनयाहू युद्ध विराम के लिए तैयार हो जाते हैं तो उनके माथे पर एक और बड़ी राजनैतिक व सामरिक पराजय का कलंक लग जाएगा जो 33 दिवसीय युद्ध में हार की याद दिलाएगा। इसके अलावा इस वक़्त जो युद्ध जारी है उसकी कुछ ख़ास विशेषताएं हैं जो पहली बार सामने आ रही हैं लेकिन अगर युद्ध जारी रहता है तो इस्राईल की सैनिक क्षति और ज़ायोनियों के जानी नुक़सान में वृद्धि का कारण बनेगा बल्कि इस बात की भी संभावना है कि युद्ध का दायरा अतिग्रहित फ़िलिस्तीन के दायरे से बाहर निकल जाए। हालिया झड़पों के दौरान पड़ोसी देशों में रहने वाले फ़िलिस्तीनी, अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन की सीमाओं में घुस गए हैं और यद्यपि जाॅर्डन, मिस्र और लेबनान की सेनाएं उन्हें 1948 और 1967 में क़ब्ज़े में लिए गए इलाक़ों में घुसने से रोकने में कामयाब रही हैं लेकिन इस आगे के लिए इसकी कोई गारंटी नहीं है कि उन्हें रोका ही जा सकेगा। इस लिए हर पल सीमावर्ती तारों और दीवारों के टूटने की संभावना मौजूद है।

इसके अलावा अवैध अधिकृत इलाक़ों के बार प्रतिरोधकर्ता गुटों के समर्थक हमेशा, ग़ज़्ज़ा में हो रहे जनसंहार पर चुप नहीं रह सकते और जैसा कि यमनियों के धमकीपूर्ण बयान से समझ में आता है, वे किसी भी क्षण फ़िलिस्तीनियों के पक्ष में मैदान में कूद सकते हैं। इस स्थिति में इस्राईल की अवैध सरकार की नौसेना भी पंगु हो जाएगी जैसा कि उसके हवाई अड्डे भी अभूतपूर्व रूप से बंद हो चुके हैं और इस्राईल, साइप्रस और यूएई जैसे अपने पड़ोसी देशों की वायु सीमा इस्तेमाल करने पर विवश है। भविष्यवाणी की जा रही है कि जैसे हीे इस्राईल के हवाई अड्डे खुलेंगे, हज़ारों ज़ायोनी, वर्तमान स्थिति के मद्देनज़र इस्राईल से फ़रार होने को प्राथमिकता देंगे और इस्राईल से उलटे पलायन की प्रक्रिया में तेज़ी आ जाएगी।

इन बातों के दृष्टिगत यही नतीजा निकलता है कि संघर्ष विराम को स्वीकार न करना नेतनयाहू की मजबूरी है लेकिन अस्ल बात यह है कि यह जंग उनके गले की हड्डी बन चुकी है। जिसने अपने ही हाथ से अपनी क़ब्र खोद ली हो उसके पास क्या रास्ता बचता है? अगर संघर्ष विराम को मानते हैं तो उनकी बड़ी फ़ज़ीहत होगी और अगर नहीं मानते हैं तो नुक़सान बढ़ता चला जाएगा। दूसरी तरफ़ व्यवहारिक रूप से कोई सच्चा मध्यस्थ भी नहीं है जो नेतनयाहू की मदद कर सके। हमास ने क़तर और मिस्र की मध्यस्थता को पहले ही ख़ारिज कर दिया है जबकि मिस्र ने मध्यस्थता का इरादा भी नहीं किया है क्योंकि आवासीय इलाक़ों और रिहाइशी इमारतों पर हमले न करने के अपने वादे को इस्राईल बुरी तरह तोड़ चुका है। अमरीका ने भी एक कनिष्ठ अधिकारी को ऐसी हालत में अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन भेजा है जब अमरीका व इस्राईल के संबंधों में अभूतपूर्व ढंग से अविश्वास का संकट छाया हुआ है, विशेष कर जो बाइडन और नेतनयाहू में शीत युद्ध चल रहा है जिसकी वजह से अमरीका की ओर से फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध और ज़ायोनी शासन के बीच किसी भी प्रकार की मध्यस्थता की संभावना ख़त्म हो गई है। (HN)

 

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