बांग्लादेश की प्रधानमंत्री का भारत दौरान, रोहिंग्या शरणार्थियों पर ख़ास बातचीत
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शैख़ हसीना वाजिद भारत के चार दिवसीय दौरे पर हैं। शैख़ हसीना वाजिद इस दौरे में अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारत के अधिकारियों से बातचीत कर रही हैं साथ ही उन्होंने रोहिंग्या शरणार्थियों के मामले में भारत से मदद मांगी है।
प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार को कहा कि भारत रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे से निपटने में उनके देश की मदद करने के लिए बहुत कुछ कर सकता है, उन्होंने कहा कि दोनों देश सीमा के आर-पार नदियों का फिर से पुनर्जीवन करने के लिए संयुक्त रूप से काम कर सकते हैं।
शैख़ हसीना ने पत्रकारों के एक समूह से अनौपचारिक बातचीत के दौरान कहा कि भारत एक बड़ा देश है, यह बहुत कुछ कर सकता है।
काउंसिल फॉर फॉरेन रिलेशन के अनुसार, म्यांमार की सराकर ने 2017 में रोहिंग्याओं के खिलाफ एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू कया जिसके कारण सात लाख रोहिंग्याओं को देश छोड़ कर भागना पड़ा, अधिकार समूहों को संदेह है कि म्यांमार सरकार ने रोहिंग्याओं का नरसंहार किया।
संयुक्त राष्ट्र और कई दूसरे देशों ने म्यांमार के सैन्य अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए और पड़ोसी देशों में भाग कर पहुंचे रोहिंग्या शरणार्थियों को मदद दी।
इस समय रोहिंग्या शरणार्थी भारत, बांग्लादेश और अन्य देशों में रिफ्यूजी कैंपों में रह रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के अनुसार, रोहिंग्या संकट का सबसे बुरा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ा है।
म्यांमार की सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ जिस प्रकार के अपराध किए थे उससे सारी दुनिया हिल गई थी। इन अपराधों की बड़े पैमाने पर निंदा की गई मगर इसका म्यांमार की सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। यहां तक कि म्यांमार की पूर्व शासक और लोकतंत्र के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाली नोबल पुरस्कार विजेता आन सान सूकी ने भी रोहिंग्याओं के मसले पर बड़ी संवेदनहीनता का सुबूत दिया।
रोहिंग्या शरणार्थी इस कोशिश में हैं कि उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के बाद उन्होंने उन इलाक़ों में पुनः बसाया जाए जहां सेना ने भीषण हमले करके उनका नरसंहार किया और उन्हें घरबार छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
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