भारत में नए संविधान का विवाद क्या है?
भारत में जहां धारा 370 हटाए जाने और समान नागरिक संहिता का विषय चर्चा में है वहीं एक विषय और भी चर्चा में आ गया है कि कहीं मोदी सरकार नया संविधान बनाने का मन तो नहीं बना चुकी है।
इस प्रकार की बहस की शुरुआत पीएम मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष के एक लेख से हुई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएएसी-पीएम) के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने एक अख़बार में नए संविधान की मांग करते हुए लेख लिखा था।
15 अगस्त को देबरॉय ने आर्थिक अख़बार मिंट में एक लेख लिखा जिसका शीर्षक थाः देयर इज़ ए केस फॉर वी द पीपल टू इंब्रेस अ न्यू कॉस्टिट्यूशन।
इस लेख में उन्होंने नए संविधान की ज़रूरत के तर्क देते हुए लिखा कि अब हमारे पास वह संविधान नहीं है जो हमें 1950 में विरासत में मिला था, इसमें संशोधन किए जाते हैं और हर बार वो बेहतरी के लिए नहीं होते, हालांकि 1973 से हमें बताया गया है कि इसकी 'बुनियादी संरचना' को बदला नहीं जा सकता है, भले ही संसद के माध्यम से लोकतंत्र कुछ भी चाहता हो, जहाँ तक मैं इसे समझता हूं, 1973 का निर्णय मौजूदा संविधान में संशोधन पर लागू होता है, अगर नया संविधान होगा तो ये नियम उस पर लागू नहीं होगा।
इससे पहले राज्य सभा में सांसद और पूर्व चीफ़ जस्टिस के संविधान की बुनियादी संरचना से जुड़े एक बयान को लेकर भी इसी प्रकार की बहसें हुई थीं।
देबरॉय ने एक स्टडी के हवाले से बताया कि लिखित संविधान का जीवनकाल महज़ 17 साल होता है, भारत के वर्तमान संविधान को औपनिवेशिक विरासत बताते हुए उन्होंने लिखा कि हमारा वर्तमान संविधान काफ़ी हद तक 1935 के भारत सरकार अधिनियम पर आधारित है. इसका मतलब है कि यह एक औपनिवेशिक विरासत है।
लेख में उन्होंने कहा है कि हम जो भी बहस करते हैं, वो ज़्यादातर संविधान से शुरू और ख़त्म होती है, महज़ कुछ संशोधनों से काम नहीं चलेगा, हमें ड्राइंग बोर्ड पर वापस जाना चाहिए और शुरू से शुरुआत करना चाहिए, ये पूछना चाहिए कि संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे शब्दों का अब क्या मतलब है, हमें ख़ुद को एक नया संविधान देना होगा।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के बारे में कहा जाता है कि उन्हें भारत का संविधान पसंद नहीं और नया संविधान उनकी इच्छा है इसलिए बहसें और भी तेज़ हो गईं।
हालांकि प्रधानमंत्री के सलाहकार पैनल की तरफ़ से सफ़ाई पेश की गई और पैनल ने ख़ुद को और केंद्र सरकार को इससे अलग कर लिया।
गुरुवार को ईएएसी-पीएम ने सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण देते हुए लिखा कि डॉ बिबेक देबरॉय का हालिया लेख उनकी व्यक्तिगत राय थी, वो किसी भी तरह से ईएएसी-पीएम या भारत सरकार के विचारों को नहीं दर्शाता।
आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भी इस लेख पर कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी का कोई आर्थिक सलाहकार है बिबेक देबरॉय, वह बाबा साहेब के संविधान की जगह नया संविधान बनाने की वकालत कर रहा है, क्या प्रधानमंत्री की मर्ज़ी से यह सब कहा और लिखा जा रहा है?
सीपीएम के सांसद जॉन ब्रिटास ने भी इस लेख पर आपत्ति जताते हुए लिखा है कि बिबेक देबरॉय नया संविधान चाहते हैं, उनकी मुख्य समस्या संविधान के बुनियादी ढांचे में दर्ज समाजवादी, सेक्युलर, लोकतांत्रिक जैसे शब्दों से हैं, हक़ीकत में वह हिंदू राष्ट्र की वकालत करते हैं, अगर उन्होंने निजी हैसियत से लिखा है तो अपना पद लेख के साथ क्यों लिखा?
शिव सेना (उद्धव ठाकरे) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा है कि वो एक नया संविधान चाहते हैं जो उनके फ़ायदे के लिए काम करे। वो एक नया विचार चाहते हैं ताकि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाए। उन्हें नए स्वतंत्रता सेनानी चाहिए क्योंकि अभी उनके पास कोई नहीं है।
आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने इस लेख पर कहा है कि आरएसएस कभी भी संविधान को लेकर सहज नहीं था इसलिए वर्तमान सरकार और इसके चीफ़ संविधान में दर्ज विचार-आज़ादी, समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता से नफ़रत करते हैं, बिबेक देबरॉय ने उनकी ही भाषा बोली है और उनके आदेश पर कहा है।
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