नक्सलवाद के पीछे का सच!
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नक्सलवाद आज भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गम्भीर ख़तरा बन चुका है। सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ की ख़बरें आम हो चुकी हैं।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Apr ३०, २०१७ १०:५७ Asia/Kolkata
  • नक्सलवाद के पीछे का सच!

नक्सलवाद आज भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गम्भीर ख़तरा बन चुका है। सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ की ख़बरें आम हो चुकी हैं।

कम्युनिस्ट पार्टियां हमेशा से नक्सलियों की हिमायती रही हैं और वामपंथी विचारधारा के लोग नक्सलियों का समर्थन करते हुए कहते हैं कि ये ग़रीबों की लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ़ बीजेपी, कांग्रेस, अन्य पार्टियां, इनके समर्थक और ज़्यादातर देशवासी नक्सलियों को आतंकवादी मानते हैं। तो अब सवाल यह खड़ा होता है आखिर ये नक्सली हैं क्या? आतंकवादी या ग़रीबों के हिमायती?


हम सबसे पहले जानते हैं कि नक्सल शब्द है क्या? 1967 में पश्चिम बंगाल राज्य के दार्जलिंग ज़िले में पड़ने वाले "नक्सलबाड़ी" गांव से किसानों का एक सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ। यह विद्रोह चूंकि नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुआ था इसलिए इसे नक्सलवाद बोला गया। इस विद्रोह के मुख्य नेता "कानू सान्याल" थे। यह विद्रोह शुरू हुआ था किसानों के अधिकारों की लड़ाई के लिए लेकिन यह जल्द ही अपने उद्देश्य से भटक गया।

 

कोलकाता के पत्रकार बाप्पादित्या पाल ने अपनी किताब "द फ़र्स्ट नक्सल" में दावा किया है कि खुद नक्सली नेता "कानू सान्याल" के अनुसार इस विद्रोह के शुरू से ही नक्सली अपने उद्देश्यों से भटक गए थे और आतंकवादी बन गए थे। कानू सान्याल का मानना था कि नक्सल विद्रोह के अपने उद्देश्यों से भटकने के बाद नक्सलियों और आतंकियों में कोई फ़र्क नहीं बचा था। कानू सान्याल ने यह भी कहा कि विद्रोह की शुरुआत में ही नक्सली आम आदमी से कट गए थे और सिर्फ़ हथियार इकट्ठा करने में लग गए थे।
इन बातों से हमें यह समझ लेना चाहिए कि इस नक्सलवाद का ग़रीबों से कोई लेना देना नहीं है और यह कुछ राज्य सरकारों और विदेशी ताकतों के हाथ का औज़ार मात्र है।


अब सवाल यह उठता है कि आदिवासियों और गरीबों का समर्थन न होने के बावजूद नक्सलवाद अब तक ज़िंदा कैसे है? इसका जवाब यह है कि इन नक्सलवादियों के कुछ राज्य सरकारों, विदेशी ताकतों और कुछ कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ संदिग्ध रिश्ते हैं जहाँ से इन्हें मदद मिलती है। उत्तरपूर्व के उग्रवादी संगठनों के माध्यम से चीन द्वारा भूटान, म्यांमार और नेपाल बॉर्डर के ज़रिये नक्सलियों को हथियार सामग्री पहुंचाई जाती है।

 
एक बड़ी अजीब बात यह भी है कि यह नक्सली सिर्फ़ उस जगह मिलते हैं जहाँ पर धरती में बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं जैसे छत्तीसगढ़ और झारखण्ड। जंगल तो और दूसरे राज्यों में भी हैं लेकिन ये नक्सली वहां नहीं पाए जाते हैं। इस बात को और भी अच्छे से समझने के लिए हमे प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खेल को समझना पड़ेगा। लेखक "फेलिक्स पैडल" की किताब "आउट ऑफ दिस अर्थ" के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों की लूट के इस खेल में दुनिया की बड़ी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां शामिल हैं।


जिस तरह हम मूर्तियों को अपना भगवान मान कर उनकी पूजा करते हैं, मस्जिद को पवित्र मान के वहाँ नमाज़ पढ़ते हैं या चर्च में प्रार्थना करते हैं, ठीक उसी तरह जंगलों में रहने वाले आदिवासी प्रकृति और पहाड़ों को पवित्र मान के उनकी पूजा करते हैं। इन्हीं पहाड़ों में दुनिया के सबसे बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन जैसे एल्युमीनियम, कोयला, लोहा आदि छिपे हैं और दुनिया की सभी कॉर्पोरेट कंपनियों की नज़र इन पर है। इन पहाड़ों के ऊपर आदिवासियों के गांव बसे हुए हैं यानि वो बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन आदिवासियों के घरों के नीचे ज़मीन के अंदर हैं। जब कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा उन प्राकृतिक संसाधनों को निकालने के लिए आदिवासियों के घर तबाह करने की कोशिश की जाती है तो आदिवासियों द्वारा इस का विरोध किया जाता है।

 

ऐसे हालात में कॉर्पोरेट कंपनियों के दबाव में खुद राज्य सरकारों के अंदर के कुछ तत्व नक्सलियों से सांठ-गांठ करके सुरक्षा बलों पर हमला करवाते हैं जिसके बाद उस इलाके में तलाशी अभियान चलाने के नाम पर उसे खाली करवाया जाता है और ग़रीब आदिवासियों को कैम्पों में भेज दिया जाता है। इसके बाद आदिवासियों के घर तबाह करके कॉर्पोरेट कंपनियां ज़मीन के अंदर से वो प्राकृतिक संसाधन निकाल लेती हैं और सरकारों से मिलीभगत के ज़रिये ये प्राकृतिक संसाधन इन कंपनियों को कौड़ियों के भाव मिल जाते हैं। इस तरीके से प्राकृतिक संसाधनों की लूट के इस खेल में राज्य सरकारों के कुछ लोग, नक्सली और कॉर्पोरेट कंपनियां आपस में मिले हुए हैं और इस खेल में ग़रीब आदिवासी बेघर हो जाते हैं।

 

अभी कुछ दिन पहले पंजाब के अंदर से आतंकवाद ख़त्म कर देने वाले पुलिस अधिकारी "के पी एस गिल" ने यह कह कर सनसनी मचा दी थी कि जब 2006 में वो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के सिक्योरिटी एडवाइज़र थे तो उन्होंने नक्सलवाद से निपटने के लिए एक प्रभावी योजना बनायी और जब उन्होंने वह योजना मुख्यमंत्री के सामने पेश की तो मुख्यमंत्री ने कहा कि आप अपनी तनख्वाह लो और मौज करो, ज्यादा इन झंझटों में मत पड़ो। यह छत्तीसगढ़ सरकार की भूमिका पर संदेह पैदा करता है। कुछ समय पूर्व कांग्रेस के नेताओं को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा उचित सुरक्षा न मुहैया कराया जाना भी संदेह पैदा करता है। उचित सुरक्षा के अभाव में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर नक्सलियों द्वारा हमला कर किया गया था जिसमे कई कांग्रेसी नेताओं की मौत हो गयी थी।


कुछ पत्रकारों ने दस्तावेजों में यह भी दर्ज किया है कि नक्सलियों द्वारा ग़रीब आदिवासियों को डराया व धमकाया भी जाता है और साथ में बंदूक का डर दिखा के गरीब आदिवासियों से अनाज भी लूटा जाता है। कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जहाँ सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गयी है और आदिवासियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया गया है। ऐसी घटनाएं नक्सलियों के लिए सताए हुए आदिवासियों को अपने झुण्ड में शामिल करना आसान कर देती हैं। ऐसी घटनाओं की केंद्र सरकार द्वारा उचित जांच करवाएं जाने की ज़रुरत है और दोषी पाए जाने वालों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए अन्यथा इसी तरह से आदिवादियों को बहका के नक्सली अपने झुण्ड में भर्ती करते रहेंगे।

 
इस नक्सलवाद को ख़त्म करने के लिए केंद्र सरकार को कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की लूट के इस खेल पर लगाम लगानी चाहिए। इसके साथ में ही सरकार द्वारा आदिवासियों के साथ एक गहरा संवाद शुरू करने की जरुरत है जिससे आदिवासियों का प्रकृति केंद्रित विकास किया जा सके। सरकार द्वारा नक्सलियों को विदेश से मिलने वाली मदद पर भी लगाम लगाई जानी चाहिए और इसी तरह केंद्र सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार की संदिग्ध भूमिका की जांच कराये जाने की भी ज़रुरत है।

 

          (लेखकः अभिमन्यु_कोहाड़)

 (नोटः लेखक के निजी विचार से पार्स टूडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं।)