भारत पाक परमाणु युद्ध-बस होते होते बचा
पाकिस्तान और भारत अपना 70वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे हैं। क्या 100वीं वर्षगांठ भी यह दोनों देश एक दूसरे के साथ मना पाएंगे? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कब तक उनकी क़िसमत साथ देती है और वह कब तक विनाश की ओर जुनूनी प्रस्थान से अपने आप को बचाए रख सकते हैं।
न्या क्या हुआ? दो सप्ताह पहले इंडियन एक्सप्रेस में एक भयावह रिपोर्ट छपी जिससे संवेदनशील लोगों के मन में सवाल उठने लगे। वैसे इस बिंदु पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया।
रिपोर्ट में बताया गया कि 24 जून 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना का एक जैगुआर विमान नियंत्रण रेखा के ऊपर उड़ रहा था और उसने पाकिस्तानी घुसपैठियों की संभावित छावनी पर लेज़र निशाना साधा। दूसरा जैगुआर विमान जो उसके ठीक पीछे उड़ रहा था उसे इस निधाने पर बमबारी करनी थी। लेकिन हुआ यह था कि अनजाने में भारतीय पायलट पाकिस्तान की सीमा के कई मील भीतर पहुंच गया था और उसने जिस छावनी पर निशाना साधा था वह पाकिस्तानी सेना की गुलतेरी क्षेत्र में स्थित फ्रंटलाइन छावनी थी।
यदि भारतीय पायलट ने ग़लती से हमला कर दिया होता तो निश्चित रूप से पाकिस्तान के युद्धक विमान और परमाणु शस्त्र हरकत में आ जाते।
भारतीय वायु सेना के एक अधिकारी ने बमबारी की अनुमति देने से इंकार कर दिया था क्योंकि उसे ग़लती का आभास हो गया था। अतः यह बम भारतीय साइड में एक प्वाइंट पर फ़ायर कर दिया गया।
एक क्षण के लिए सोचिए कि यदि बमबारी की अनुमति दे दी गई होती तो शायद इतिहास की दिशा ही बदल गई होती। उस समय गुलतेरी छावनी में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख जनरल मुशर्रफ़ सैनिकों को संबोधित कर रहे थे। लेज़र गाइडेड बम पाकिस्तान के उच्च नेतृत्व का सफ़ाया कर सकता था।
यदि एसा हो जाता तो क्या पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय इस भयानक ग़लती के स्पष्टीकरण और माफ़ी की प्रतीक्षा करता? या पाकिस्तान के युद्धक विमान और परमाणु हथियार हरकत में आ जाते? इसमें बस कुछ ही मिनट या कुछ ही घंटे लगेंगे।
पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को हमले के लिए तैयार होता देख भारतीय क्या करते? क्या भारतीय विमान पाकिस्तान की वायु छावनियों और मिसाइल केन्द्रों को निशाना बनाते? यानी हमला और जवाबी हमला।
उस दिन दक्षिणी एशिया की क़िसमत ने साथ दिया। लेकिन जब भारत पनडुब्बियों पर परमाणु हथियार स्थापित कर रहा है और पाकिस्तान भी उसी दिशा में बढ़ रहा है तो नए सिरे से ख़तरा बढ़ रहा है। पनडुब्बियों से ग़लती से मिसाइल फ़ायर हो जाने का रिस्क विमान और ज़मीनी लांच पैड से अधिक होता है।
इसकी वजह यह है कि पनडुब्बी की कोशिश यह होती है कि वह छुप जाए और तलाशने की कोशिश को नाकाम बना दे। यह सभी पनडुब्बियों को करना पड़ता है। लेकन भारत और पाकिस्तान का मामला यह है कि पाकिस्तान का एगोस्टा-908 टाइप की डीज़ी पनडुब्बियां बहुत शोर मचाती हैं और उन्हें खोजा जा सकता है। भारत का दावा है कि कराची पहुंचने वाली पनडुब्बी उसकी नज़र में है। इस तरह पाकिस्तान अब और भी परमाणु बनडुब्बियां बनाने की कोशिश करेगा और इस तरह सुरक्षा के लिए ख़तरा बढ़ता जाएगा।
क्युबा मिसाइल संकट के दौरान यह हुआ था कि सोवियत संघ की एक पनडुब्बी ने ख़ुद को अमरीकी युद्धपोतों के बीच घिरा हुआ पाया इन युद्धपोतों ने पानी पानी के भीतर धमाका करना शुरू कर दिया ताकि पनडुब्बी पानी की सतह पर आ जाए। सोविय संघ की पनडुब्बी सतह पर आए बग़ैर मस्को से संपर्क नहीं कर सकती थी अतः कोई निर्देश लेना असंभव था। अमरीकी युद्धपोतों को यह नहीं पता था कि इस पनडुब्बी कें परमाणु शस्त्र युक्त तारपीडो मौजूद हैं।
सोवियत संघ की पनडुब्बी ने अपने ऊपर हमला होते देखा और उसे यह लगा कि युद्ध शुरू हो चुका है तो पनडुब्बी के कप्तान ने अमरीकी युद्धपोतों को भगाने के लिए परमाणु तारपीडो का हमला करने का मन बना लिया। लेकिन अन्य सहयोगी सहमत नहीं हुए अतः पनडुब्बी को सतह पर आना पड़ा। यदि कैप्टन ने हमला कर दिया होता तो परमाणु युद्ध छिड़ सकता था।
साभार डान न्यूज़