ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा और न्यूज़ चैनल्स
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मंगलवार को ट्रिपल तलाक़ पर सुप्रिम कोर्ट का फ़ैसला आने वाला था और सोमवार की रात से ही चैनलों ने ऐसा माहौल बनाया था कि जैसे “ ज़मीन जाग रही है कि इंक़ेलाब है कल” हर चैनल कह रहा था कि कल भारत की मुस्लिम महिलाओं के भाग्य का फ़ैसला होने वाला है, ऐसा लग रहा था कि जैसे हर शहर में तलाक़ पाने वाली महिलाओं की भीड़ लगी हो या फिर भारत की हर मुस्लिम महिला को उसके पति ने (ख़ुदा ना ख़ास्ता) तीन बार तलाक़ कह कर बाहर कर दिया हो।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Aug २३, २०१७ ११:४३ Asia/Kolkata
  • ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा और न्यूज़ चैनल्स

मंगलवार को ट्रिपल तलाक़ पर सुप्रिम कोर्ट का फ़ैसला आने वाला था और सोमवार की रात से ही चैनलों ने ऐसा माहौल बनाया था कि जैसे “ ज़मीन जाग रही है कि इंक़ेलाब है कल” हर चैनल कह रहा था कि कल भारत की मुस्लिम महिलाओं के भाग्य का फ़ैसला होने वाला है, ऐसा लग रहा था कि जैसे हर शहर में तलाक़ पाने वाली महिलाओं की भीड़ लगी हो या फिर भारत की हर मुस्लिम महिला को उसके पति ने (ख़ुदा ना ख़ास्ता) तीन बार तलाक़ कह कर बाहर कर दिया हो।

आख़िरकार हर एंकर ने पूरी रात कांटों के बिस्तर पर गुज़ारी और सुबह होते ही सुप्रिम कोर्ट की बिल्डिंग से लौ लगाकर बैठ गया और जैसे तैसे करके सुबह के दस बजते ही सुप्रिम कोर्ट का दरवाज़ा खोले जाने से लेकर जजों के अंदर जाने तक की न्यूज़ ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में चलाई और फिर सबसे पहले और सबसे जल्दी ख़बर पहुंचाने की दौड़ आरंभ हो गयी, एक जज ने फ़ैसला सुनाया तो कुछ रिपोर्टर उसी को ले उड़े और कह दिया कि सुप्रिम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक़ को वैध क़रार दे दिया है, फिर दूसरे जज ने जो कहा उसको ले उड़े, ख़बरें बदल बदल कर अपनी तेज़ रफ़्तारी के प्रतिशत बढ़ते रहे और जब फ़ैसला वैसा ही आया जिसकी आशा वह वर्षों से लगाए बैठे थे, अर्थात जब पांच जजों की बेंच में तीन ने फ़ैसला ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ दिया तो चेहरों पर ऐसी मुसकान खिली कि जैसे न्यूज़ चैनलों के प्रस्तोता से ज़्यादा किसी के दिल में मुस्लिम महिलाओं का दर्द था ही नहीं।

दूसरी ओर धर्मगुरुओं, राजनेताओं, वकीलों और महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करने वाली महिलाओं की लाइनों में भी बहार आ गयी, हालत यह हो गयी कि भाग लेने वालों की संख्या कम पड़ गयी और चैनल ज़्यादा पड़ गये, हर चैनल बस इसी अंदाज़ से अपनी विशेष रिपोर्ट चला रहा था कि जैसे उसने किसी नरक के दरवाज़े बंद करके महिलाओं के लिए स्वर्ग की खिड़की खोल दी हो, हर चैनल अपने अपने हिसाब से नये नये चेहरे ढूंढ ढूंढ कर ला रहा था, संघ परिवार के लोगों में भी सुबह से जश्न का माहौल था यूं कहूं कि बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना वाला गाना तो सुना था किन्तु देखा पहली बार, बेगानी तलाक़ की सभा में संघ परिवार वाले दीवाने हुए जा रहे थे। संघ वालों के चेहरे पर ग़ज़ब की मुसकुराहट थी,  उनको लग रहा था कि वह जो चाहते थे वह सुप्रिम कोर्ट ने कर दिया।

मज़े की बात यह है कि वह लोग भी सुप्रिम कोर्ट के फ़ैसले पर तालियां बजा रहे थे, जिन्होंने कभी काशी, मथुरा और वृन्दावन की गलियों में भटकती उन महिलाओं का दुख दर्द समझने की कोशिश नहीं की जिनको उनकी नालायक़ संतानें बेसहारा छोड़कर चली गयीं, प्रधानमंत्री से लेकर विपक्ष तक के नेताओं की ओर से सुप्रिम कोर्ट के फ़ैसले के स्वागत पर आधारित बयान जारी हो रहे थे और उनके बयानों को वह अत्याचारग्रस्त महिलाएं भी देख रही थीं जिनके पतियों ने तलाक़ दिए बिना उनसे दूरी कर ली है, किन्तु क्या किया जाए तिल को ताड़ बनाने में यह लोग दक्ष हैं। एक प्रतिशत से भी कम मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बनाकर देश को मूर्ख बनाया गया। वैसे सुप्रिम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया उनका अनुमान सबको पहले से था क्योंकि यह बात पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी मान ली थी कि ट्रिपल तलाक़ एक ग़लत रस्म है और इसको समाप्त करने के लिए वह माहौल बनाएगा।

हमारे ख़्याल में मुसलमानों को इस मामले पर अधिक हो हल्ला भी करना नहीं चाहिए क्योंकि सब ही यह बात कह रहे थे कि सुप्रिम कोर्ट का जो फ़ैसला होगा वह हमको स्वीकार होगा, हालांकि तीन तलाक़ को एकदम से समाप्त करना बहुत कठिन है और सदियों पुरानी इस रस्म पर मुसलमान एक क्षण में अमल करना बंद करेंगे तो ऐसा नहीं लगता, वैसे एक सवाल यह भी है कि ट्रिपल तलाक़ पर प्रतिबंध लगने से क्या तलाक़ का क्रम बंद हो जाएगा?

हमारे ख़्याल में तीन तलाक़ नहीं बल्कि तलाक़ दी गयी महिलाओं के ख़र्चे पानी का प्रबंध न होना ही एक मुख्य मुद्दा है। तलाक़ चाहे अकेले में दिया जाए या गवाहों की उपस्थिति में, कोर्ट में दिया जाए या मौलवी साहब की आफ़िस में, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि जब तलाक़ दी गयी महिलाओं को उनके अधिकार नहीं दिए जाते किन्तु समस्या यह है कि यहां के नेताओं को महिलाओं के मुद्दे हल करने में नहीं बल्कि मुसलमानों को बदनाम करने में रुचि है।

शकील शम्सी

भारत के प्रसिद्ध पत्रकार और विश्लेषक हैं।