भारतीय रिज़र्व बैंक ने नकारा इस्लामी बैंकिंग को
भारत के रिज़र्व बैंक ने इस्लामी सिद्धांतों पर चलने वाली बैंकिंग व्यवस्था लागू करने के विचार को नकार दिया है।
इससे पहले रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की अध्यक्षता वाली एक समिति ने भारत में ब्याज रहित बैंकिंग के मुद्दे पर गहराई से विचार करने की ज़रूरत पर जोर दिया था। तत्कालीन सरकार ने रिजर्व बैंक से कहा था कि देश में इस्लामिक बैंकिंग शुरू करने की दिशा में उठाये गए कदमों की विस्तृत जानकारी उसे उपलब्ध कराई जाए।
भारतीय रिजर्व बैंक ने इससे पहले पारंपरिक बैंकों में धीरे-धीरे इस्लामिक बैंक सुविधा देने का प्रस्ताव दिया था। केंद्र और रिजर्व बैंक दोनों ही लंबे समय से इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत करने की संभावनाओं पर विचार करते रहे हैं। रिज़र्व बैंक के अनुसार इस्लामी बैंक के माध्यम से समाज के उस वर्ग को देश की वित्तीय प्रणाली से जोड़ा जा सकेगा जो धार्मिक कारणों विशेषकर ब्याज के कारण इससे दूर है।
इसी बीच आईआरबीआई की ओर से 12 नवंबर 2017 को घोषणा की गई है कि शरीया के सिद्धांतों पर चलने वाली ब्याज रहित बैंकिंग व्यवस्था शुरू करने के प्रस्ताव पर आगे कोई कार्रवाई न करने का निर्णय लिया गया है। आरबीआई ने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत पूछे गए एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी है। रिजर्व बैंक ने कहा है कि सबके लिए बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाओं के समान अवसर उपलब्ध कराने पर विचार किए जाने के बाद निर्णय लिया गया है कि भारत में इस्लामिक बैंकिंग शुरू करने के प्रस्ताव पर आगे कोई कदम नहीं उठाया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि इस्लामी सिद्धांतों पर काम करने वाली बैंकिंग व्यवस्था को इस्लामिक बैंकिंग कहा जाता है। इन बैंकों की विशेषता यह है कि इनमें किसी तरह का ब्याज न तो लिया जाता है और न ही दिया जाता है। इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था में बैंक को होने वाले लाभ को इसके खाताधारकों में बराबर से बांट दिया जाता है।