पूजा, एक चाभी, एक ताला
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हारने और न जीतने के बीच अच्छा ख़ासा अंतर है। कांग्रेस पार्टी हिमाचल प्रदेश का चुनाव हार गई और गुजरात का चुनाव नहीं जीत पाई।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Dec १९, २०१७ १७:३४ Asia/Kolkata
  • पूजा, एक चाभी, एक ताला

हारने और न जीतने के बीच अच्छा ख़ासा अंतर है। कांग्रेस पार्टी हिमाचल प्रदेश का चुनाव हार गई और गुजरात का चुनाव नहीं जीत पाई।

दोनों ही चुनावों का असाधारण महत्व था क्योंकि इससे इस बात का फ़ैसला होने वाला है कि फ़ासीवादी ताक़तों के सामने संघर्ष जारी रहेगा या हथियार डाल दिए जाएंगे। श्रेय और आरोप को कोई मुद्दा नहीं समझा जा सकता लेकिन इससे जो कुछ हुआ उससे समझने में मदद मिलती है।

एक व्यक्ति था जो कोई भी कठिन ताला खोल सकता था यदि उसकी चाभी खो गई है। वह पहले आंख बंद करके पूजा करता था, फिर ताले पर फूंकता था, फिर अपने थैले से चाभियों का गुच्छा निकालता था और उनमें से किसी एक चाभी से ताला खुल जाता था। यह कहानी राहुल गांधी के लिए रूचिकर रही होगी। उन्होंने गुजरात चुनावी अभियान के दौरान कई मंदिरों के दर्शन किए, शायद हिमाचल प्रदेश में भी उन्होंने यही किया होगा। हम यह पूछना चाहिए कि कैसे इसका फ़ायदा उन्हें गुजरात में मिला जहां उनकी पार्टी ने प्रदर्शन तो अच्छा किया लेकिन जीत से पीछे रह गई जबकि हिमाचल प्रदेश में इसका फ़ायदा नहीं मिला।

हम यह मान लेते हैं कि गुजरात में किसी पूजा ने नहीं बल्कि किसी चाभी ने ही काम किया। यह एक सच्चाई है कि राहुल गांधी  इस समय एक अच्छे वक्ता बन चुके हैं जो वह पहले नहीं थे। उन्होंने दिखाया कि उनके अंदर निर्णायक चुनावी कैंपेन चलाने की क्षमता और गुण हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यदि अपने कठोर और संवेदनहीन ज़बान का प्रयोग न किया होता तो शायद अपने वोट गवां बैठते। यह भी सही है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने भी प्रधानमंत्री का बड़ा काम बनाया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस भारतीय ट्रिक पर उन्हीं का कापीराइट है?

गुजरात का इतिहास देखा जाए तो यह हिंदू-मुस्लिम अविश्वास वाला इलाक़ा रहा है जहां मोदी को ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। लेकिन फिर भी कुछ न कुछ बदल ज़रूर गया है। इस बार के चुनाव में जिस तरह से मोदी ने मनमोहन सिंह को निशाना बनाया और पूर्व सेना प्रमुख और उच्चायुक्त को भी नहीं छोड़ा लेकिन यह हथकंडा भी कारगर नहीं हुआ। इससे यह भी पता चला कि मोदी कांग्रेस के चुनावी कैंपेन से असहज बल्कि भयभीत हो गए थे।

कांग्रेस के नए अध्यक्ष ने जो बातें कहीं वह दिल को छूने वाली थीं। उन्होंने कहा कि हममें से बहुत से लोग इस समय की राजनीति से व्यथित हैं, हम अपने सामने जो कुछ देख  रहे हैं वह कृपा और सत्य के विभाजन की राजनीति है। राहुल गांधी ने कहा कि राजनीति का संबंध आम जनता से है। यह जनता का हथियार है जिसकी मदद से वह उन ढांचों को गिरा सकती है जो जनता को दबाते, चुप कराते और कमज़ोर करते हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने बड़ी संवेदनशीलता के साथ यह बात कही लेकिन हम कैसे भूल सकते हैं कि गुजरात के मुसलमानों के लिए एक शब्द भी नहीं कहा गया जो 6 करोड़ अस्सी लाग की गुजराती आबादी का 9 प्रतिशत हैं।

हमें यह भी देखना है कि राहुल गांधी अब मोदी सरकार को किस तरह घेरते हैं। यह बहुत ज़रूरी है कि मोदी का डाक्टर मनमोहन सिंह जैसी हस्तियों पर आरोप लगाने के मामले में विरोध किया जाना चाहिए।

वैसे यह आसान प्रदर्शन होगा। हमने राजस्थान में एक हिंदूवादी के हाथों बंगाली मज़दूर की निर्मम हत्या पर राहुल गांधी की ओर से कोई विरोध नहीं सुना। हालिया दिनों देश के विभिन्न भागों में ईसाइयों को जेल में डाले जाने की घटनाओं के बारे में भी हमने राहुल गांधी के मुंह से एक शब्द भी नहीं सुना। हम यह जानना चाहते हैं कि क्या राहुल गांधी किसी विधायक के उर्दू में शपथ लेने पर भाजपा के विरोध से सहमत हैं। राहुल गांधी आने वाले मुक़ाबलों के लिए चाभियां तो प्रयोग कर सके हैं लेकिन चिंता की बात तब होगी जब वह इसके बजाए पूजा शुरू कर देंगे।