सुंजवां हमला कुछ सोचने पर मजबूर करता है
भारत नियंत्रित जम्मू व कश्मीर के सुंजवां इलाक़े में भारतीय सेना की छावनी पर होने वाले हमले का मुद्दा गंभीर रूप से चर्चा में है।
इस हमले में मरने वालों की संख्या सात तक पहुंच चुकी है। जम्मू व कश्मीर लाइट इनफ़ैन्ट्री की 36 ब्रिगेड की छावनी पर गत शनिवार को हमला हुआ था। यह हमला पूरी तरह हथियारबंद हमलावरों की टीम ने अंजाम दिया। हमलावर छावनी के आवासीय भाग तक पहुंचने में सफल हो गए। इस हमले में कोई लोग घायल हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों में सैनिक प्रतिष्ठानों पर होने वाला यह महत्वपूर्ण हमला है।
भारत में टीकाकारों का कहना है कि सबसे चिंता का विषय यह है कि हमलावर सेना की छावनी में घुसने में सफल हो जाते हैं। हर घटना के बाद सेना मामले की जांच करती है ताकि कमियों को चिन्हित करे। मगर सुंजवां हमले से पता चलता है कि पठानकोट हमले के बाद सैनिक प्रतिष्ठानों की सरक्षा बढ़ाने और हर प्रकार की चूक की संभावना को दूर करने के लिए जो प्रयास किया गए हैं वह पर्याप्त नहीं हैं। जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर होने वाले हमले के बाद उड़ी, हंदवारा, नगरोटा और पन्ज़गाम में भी हमले हो चुके हैं।
पठानकोट हमले के बाद एक पूर्व सेना उपाध्यक्ष लेफ़्टिनेन्ट जनरल फ़िलिप कमपोस के नेतृत्व में देश भर में सैनिक छानियों की सुरक्षा आडिट हुई। जांच में कुछ छावनियों को संवेदनशील क़रार देते हुए वहां की सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए गए। इसके अलावा जुलाई 2017 में सरकार ने तीनों बलों को सैनिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए भारी बजट दिया। मगर सुंजवां के हमले से एसा लगता है कि जांच और नीतियों की घोषणा से आगे बढ़कर ज़मीन पर कुछ और करने की ज़रूरत है।
सुंजवां हमले के संदर्भ में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है। यह वीडिया हमले में मारे गए कश्मीरी सैनिक की पत्नी की बताई जाती है। पत्नी ने यह गंभीर आरोप लगाया है कि वह हमले के समय छावनी के भीतर मौजूद थी और उसके पति को हमलावरों ने नहीं बल्कि सैनिकों ने मारा है।