मासूम की मौत हमसे क्या कहती है?
कठुआ सामूहिक बलात्कार और हत्या कांड ने सबको हिला कर रख दिया। मासूम बच्ची पर दो बार ज़ुल्म का पहाड़ टूटा। एक तो उस समय जब उसे दरिंदों के बीच रहना पड़ा यातनाएं झेलनी पड़ीं और मौत की नींद सोना पड़ा।
उसकी मौत के बाद हमारी राजनीति ने उस पर दोबारा ज़ुल्म का पहाड़ तोड़ा। पूरे देश ने इस पीड़ा को महसूस किया और सबको शर्म आई बह हमारे नेताओं को छोड़कर। उनका बर्ताव एसा था कि जैसे बच्ची को कई दिन तक मंदिर के भीतर बंद रखना, उसे नशा देकर उसके साथ बलात्कार करना और उसकी हत्या कर देना सब कुछ सामान्य बात है और सब कुछ पुलिस के साथ मिलकर अंजाम देना। देश की दोनों बड़ी पार्टियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। उन्हें होश तब आया जब मीडिया ने प्रदर्शित करना शुरू किया कि देश में आम लोगों में इस घटना पर कितना रोष और शार्मिन्दगी का भाव है। तब नेताओं ने अपने तय शुदा खोखले बयान देने शुरू कर दिए।
व्यक्तिगत रूप से जब मुझे सुनने को मिलता है कि क़ानून अपना काम करेगा तो मैं यह जानती हूं कि क़ानून अपना काम नहीं करेगा और अगर करेगा तो किसी नतीजे तक पहुंचने में कई दशक लग जाएंगे। बच्ची के परिवार ने इतनी तो हिम्मत की कि केस दर्ज करवाया लेकिन जम्मू के वकीलों ने क़ानून का रास्ता ही बंद कर दिया इसलिए कि हिंदुत्व और चरमपंथी राष्ट्रवाद ने उनकी आंखों को अंधा कर दिया था क्योंकि पीड़ित मासूम मुसलमान थी और बलात्कारी हिंदू थे। इन वकीलों को क़ानूनी प्रक्रिया में व्यवधान डालने के कारण गिरफ़तार कर लिया जाना चाहिए था। मगर जम्मू व कश्मीर की मुख्यमंत्री ने इस बार भी अक्षमता का प्रदर्शन किया।
बच्ची के साथ जो कुछ हुआ उस पर एक और ग्रुप है जो अपनी जगह से हिला नहीं। यह चरम राष्ट्रवादी हिंदुत्व ग्रुप है। यह गुट पिछले तीन साल से अपनी आवाज़ अधिक से अधिक ऊंची करता रहा है विशेष रूप से सोशल मीडिया पर। जब भी मैने इस बच्ची के लिए कोई ट्वीट किया गया सोशल मीडिया पर मुझ पर इसी ग्रुप ने हमला कर दिया कि मैं कभी असम और पश्चिम बंगाला में बलात्कार का निशाना बनने वाले हिंदु लड़कियों का मुद्दा क्यों नहीं उठाती। मैं आपको बताना चाहती हूं कि इसकी क्या वजह है। जब एक बच्ची का बलात्कार किया जाता है और बर्बरता के साथ उसकी हत्या कर दी जाती है तो मैं कभी यह नहीं पूछता कि उसका धर्म क्या था? लेकिन चरम राष्ट्रवादी हिंदुत्व यह सवाल ज़रूर करता है। यह लोग सोचते तो यही हैं कि वह बहुत बड़े देशप्रेमी हैं लेकिन हक़ीक़त में वह देश के दुशमन हैं। मैंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि उनका यह राष्ट्रवाद भारत को बड़े ख़तरनाक रूप से नुक़सान पहुंचा रहा है।
उनका राष्ट्रवाद वैसा राष्ट्रवाद नहीं है जिसने हमें औपनिवेशिक व्यवस्था से आज़ादी दिलाई थी। चरम राष्ट्रवादी अपने मन में यह धुनते रहते हैं कि मुस्लिम हमलावरों ने शताब्दियों पहले भारत के साथ क्या किया था। वह मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी हज़ारों साल के बाद पहले वास्तविक हिंदू शासक बने हैं और अब मुसलमानों से बदला लेने की उनकी बारी आई है। मासूम बच्ची के पिता ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि बच्ची को यह पता ही नहीं था कि हिंदू मुस्लिम का क्या मतलब होता है। बाप ने छलकती आंखों के साथ यह बात कही। मगर चरम राष्ट्रवादी तत्वों की नज़र में वह मुस्लिम लड़की थी और उसके साथ जो कुछ हुआ वह सब हिंदू महिलाओं के साथ मुस्लिम हमलावरों द्वारा शताब्दियों पहले किए गए बर्ताव का बदला था। यह बातें मैं अपनी तरफ़ से नहीं कह रही हूं, आप सोशल मीडिया पर भ्रमण करके देख लीजिए कि चरम राष्ट्रवादी हिंदुत्व से जुड़े लोग क्या लिख रहे हैं।
सबसे चिंता का विषय तो यह है कि हमारे नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इन चरम राष्ट्रवादियों के हाथों भारतीय समाज को क्या नुक़सान पहुंच रहा है?!
इस नन्हीं बच्ची की पीड़ादायक मौत ने भारत के चेहरे के सामने एक आइना रख दिया है जिसमें भारत का चेहरा उतना ही कुरूप लग रहा है जितना कि हमारे नेता इस मामले में बोलने से डर रहे हैं।
तवलीन सिंह
(यह लेख वरिष्ठ लेखिका तवलीन सिंह के इंडियन एक्सप्रेस में छपे अंग्रेज़ी लेख का संक्षिप्त अनुवाद है)