भीड़ तंत्र दरअस्ल हिंसा और आतंकवाद की परवरिश का रास्ता
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बुलंदशहर के पास गौरक्षकों की हिंसा में इंसपेक्टर सुबोध कुमार की गोली मारकर हत्या और घटना के दौरान पथराव करने वाले सुमित नामक व्यक्ति की मौत और उसके बाद के घटनाक्रम पर नज़र डाली जाए तो यह बात बिलकुल साफ़ दिखाई देती है कि उत्तर प्रदेश सरकार इस पूरी घटना में तर्कहीन दिखाई दे रही है।
सरकार इस घटना के बारे में जो भी स्टैंड ले रही है और जो बयान जारी कर रही है उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
योगी सरकार ने उच्च स्तरीय बैठक के बाद जो प्रेस रिलीज़ जारी की उसमें कहीं भी सुबोध कुमार सिंह का उल्लेख नहीं किया जो अपनी ड्यूटी के दौरान मार दिए गए। प्रेस रिलीज़ में गौहत्या की बात कही गई, साज़िश की बात कही गई मगर गौरक्षकों के तांडव का कहीं उल्लेख नहीं किया गया।
पुलिस पर हमला करने वाले पत्थरबाज़ सुमित को मीडिया पर जारी होने वाले घटना के वीडियो में स्पष्ट रूप से पत्थरबाज़ी करते देखा जा सकता है लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने उसको भी दस लाख का मुआवज़ा देने का एलान किया है।
भारत मे दरअस्ल एक ट्रेंड चल पड़ा है जिसके तहत जाने पहचाने बल्कि कुख्यात और बदनाम संगठनों के सदस्य कहीं भी एकत्रित हो जाते हैं और किसी पर भी हमला कर देते हैं और किसी की भी हत्या कर दी जाती है। इसे माब लिंचिंग का नाम दिया गया है। दादारी में मोहम्मद अख़लाक़, राजस्थान में पहलू ख़ान, दिल्ली के क़रीब जुनैद सहित दर्जनों लोग माब लिंचिंग में मारे जा चुके हैं और देखने में यह आया है कि हत्या के बाद बड़ी आसानी से हत्यारे बच जाते हैं यहां तक कि कुछ मामलों में तो हत्यारों पर स्टिंग आप्रेशन भी किया गया जिसमें वह अपने हमलों की दास्तान बड़ी गर्व से सुनाते हुए देखे गए मगर फिर भी कुछ नहीं हुआ। होता यह है कि बड़े सोचे समझे समझे तरीक़े से केस को कमज़ोर करने की कोशिश की जाती है।
यही सब कुछ इस समय सुबोध कुमार सिंह की हत्या के मामले में भी दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार, भाजपा की केन्द्र सरकार तथा भाजपा के सहयोगी संगठन बड़ी तनमयता से इस पूरे प्रकरण का रुख़ हिंदू मुस्लिम विवाद की ओर मोड़ने में जुटे हुए हैं मगर उनके सामने समस्या यह आ पड़ी है कि हमला करने वाले भी हिंदूवादी संगठन के सदस्य थे और मारे गए इंसपेक्टर भी बहुसंख्यक समुदाय के थो जो ईमानदारी और बहादुरी के साथ अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे। यही इस घटना का सबसे प्रमुख पहलू है कि जब भीड़ तंत्र का रास्ता अपनाया जाता है और उसे हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है तो एक समय वह आता है कि यही भीड़ बेक़ाबू हो जाती है और वह सब कुछ भी कर बैठती है जो योजना में शामिल नहीं होता बल्कि योजना के विपरीत होता है। भीड़ तंत्र को योजनाबद्ध तरीक़े से प्रयोग करने का एक भयानक आयाम यह है कि इसमें युवा और किशोर बड़ी आसानी से अपराधी बन जाते हैं और हत्या जैसे जघन्य अपराध करके उन्हें किसी बात का पछतावा नहीं रहता। स्टिंग आप्रेशन में यदि हत्यारों की बातचीत सुनी जाए तो साफ़ ज़ाहिर होगा कि दरिंदगी पर उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है। उनकी हिंसा का शिकार होने वाला व्यक्ति आख़िरी सांसे लेते समय पानी मांगता है और वह पानी नहीं देते हैं तो इस पर भी उन्हें गर्व होता है।
तो भीड़ तंत्र वास्तव में हिंसा, दरिंदगी और आतंकवाद के पालन पोषण का रास्ता है और इसका अंजाम देखना है तो उन देशों पर एक नज़र डाल लेना चाहिए जो आज इसका ख़मियाज़ा भुगत रहे हैं।