चरमपंथी संगठन कभी वरदान तो कभी मुसीबत!
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भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव है। भारत में गत 14 फ़रवरी को सीआरपीएफ़ के कारवां पर आत्मघाती हमला हुआ। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान स्थित जैशे मुहम्मद को ज़िम्मेदार माना।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Mar २८, २०१९ १५:२९ Asia/Kolkata
  • चरमपंथी संगठन कभी वरदान तो कभी मुसीबत!

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव है। भारत में गत 14 फ़रवरी को सीआरपीएफ़ के कारवां पर आत्मघाती हमला हुआ। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान स्थित जैशे मुहम्मद को ज़िम्मेदार माना।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कई बार कहा कि यदि भारत ठोस सुबूत दे तो उनकी सरकार कार्यवाही करेगी। भारत का कहना है कि उसने डोज़ियर दिया मगर पाकिस्तान का कहना है कि डोज़ियर अपर्याप्त है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता डाक्टर मुहम्मद फ़ैसल ने अपनी प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा कि पाकिस्तान ने सभी विवादों के हल के लिए भारत को वार्ता का कई बार प्रस्ताव दिया लेकिन भारत बातचीत के लिए तैयार नहीं है। भारत ने जो डोज़ियर दिया है उसकी समीक्षा की गई, भारत की ओर से उठाए गए सभी प्रश्नों के उत्तर दिए गए। उनका कहना था कि भारत के डोज़ियर में कहीं भी जैशे मुहम्मद के सरग़ना मसऊद अज़हर का नाम तक नहीं है और पुलवामा हमले से मसऊद अज़हर के किसी भी संबंध का दावा नहीं किया गया है। भारत ने अपने डोज़ियर में सभी तकनीकी जानकारियां दी हैं जिनके अनुसार जांच की गई मगर इसमें पाकिस्तान का किसी तरह से कोई संबंध साबित नहीं हुआ। यदि भारत के पास कार्यवाही के लायक़ कोई सुबूत है तो हमें दे क्योंकि हमें अभी और जानकारियों की ज़रूरत है।

वैसे पाकिस्तान इससे पहले भी अलग अलग संगठनों के बारे में इसी प्रकार के बयान देता रहा है। पाकिस्तान तो अलक़ायदा के सरग़ना ओसामा बिन लादेन तथा इस आतंकी संगठन के अन्य सरग़नाओं के बारे में भी यही कहता रहा है कि यदि दावा करने वाले देश के पास ठोस सुबूत हैं तो हमें दे हम कार्यवाही करेंगे। पाकिस्तान के संदर्भ में यह एक हक़ीक़त है कि वह बहुत से सशस्त्र गुटों को अपनी विदेश नीति का मज़बूत बाज़ू समझता रहा है। तालेबान का गठन और फिर उन्हें अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में पहुंचाना पाकिस्तान को बहुत कामयाब प्रयोग नज़र आया। कहा जाता है कि पाकिस्तान की सेना और इंटैलीजेन्स एजेंसी ने अफ़ग़ानिस्तान से मध्य एशिया के देशों की ओर इसी शैली में आगे बढ़ने की नीति बनाई और इस नीति के तहत अलग अलग देशों के चरमपंथियों को शरण और ट्रेनिंग दी गई।

कश्मीर पर पाकिस्तान का दावा पुराना है, कशमीर के संदर्भ में भी पाकिस्तान की यही नीति रही कि उसने कश्मीरी संगठनों की मदद की। इन संगठनों को पाकिस्तान में शरण और ट्रेनिंग मिली जिन्होंने भारत नियंत्रित कश्मीर में जाकर कार्यवाहियां कीं। कश्मीर के संबंध में भारत सरकार की नीतियां भी एसी रहीं जिनसे भारत विरोधी भावना पनपने लगी और इस समय भारतीय सुरक्षा बलों और सरकार के ख़िलाफ़ कश्मीर में काफ़ी रोष पाया जाता है।

वैसे यह नीति केवल पाकिस्तान की नहीं है। जिस समय पूर्वी पाकिस्तान में संकट पैदा हुआ और वहां अलग देश बनाने का अभियान चला तो भारत की ओर से इस अभियान का समर्थन किया गया और वहां सक्रिय संगठनों और तत्वों को भारत ने अपनी धरती पर शरण दी और उन्हें ट्रेनिंग भी दी गई। भारत के पूर्वोत्तरी राज्यों में उस समय के बसे हुए बहुत से लोगों के परिवार आज तक वहां मौजूद हैं।

चरमपंथी संगठनों के मामले में 1980 के दशक में पाकिस्तान को अमरीका और सऊदी अरब का भी भरपूर समर्थन प्राप्त रहा। यह वह समय था जब अमरीकी मीडिया में भी तालेबान की तारीफ़ होती थी और उन्हें साहसी संघर्षकर्ता माना जाता था क्योंकि वह अमरीका के मुख्य प्रतिद्वंद्वी सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे।

हालात बदल गए, नीतियां बदल गईं, अमरीका ने इन्हीं तालेबान को आतंकी संगठन मान लिया और उन पर हमला करके उनकी सरकार गिरा दी। अब एक बार फिर तालेबान से ही अमरीका बातचीत कर रहा है और अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में तालेबान के लौटने का रास्ता साफ़ हो गया है। हालत यह है कि अमरीका काबुल सरकार की नाराज़गी मोल लेकर भी तालेबान से बातचीत कर रहा है और भविष्य के लिए समन्वय बनाने में व्यस्त है।

इस तरह देखा जाए तो अलग अलग देश सशस्त्र संगठनों की मदद करते हैं और उन्हें प्रयोग भी करते हैं मगर आम तौर पर मेज़बान देश नुक़सान उठाता है। यही कारण है कि तालेबान के गठन में पूरी तरह शामिल अमरीका अपने ऊपर कोई भी आरोप लेने के लिए तैयार नहीं है जबकि वह पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है।

पाकिस्तान इस मामले में बुरी तरह फंस गया है। पाकिस्तान पर फ़ायनेन्शियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ओर से चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने का दबाव कई साल से पड़ रहा है और पाकिस्तान ने अपने आर्थिक हितों को बचाने के लिए चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ कार्यवाही के उद्देश्य से नेशनल एक्शन प्लान बनाया मगर एफ़आईटीएफ़ के तहत काम करने वाली संस्था एशिया पेसिफ़िक ग्रुप एपीजी ने पाकिस्तान की ओर से प्रतिबंधित संगठनों के ख़िलाफ़ की जाने वाली कार्यवाही को अपर्याप्त बताते हुए कठोर शब्दों में आशंका जताई है। एफ़एटीएफ़ पाकिस्तान का नाम ग्रे लिस्ट में शामिल कर चुका है जबकि ब्लैक लिस्ट होने का ख़तरा भी कई बार पाकिस्तान के क़रीब पहुंच गया मगर तुर्की जैसे कुछ सदस्य देशों की मदद से पाकिस्तान ब्लैक लिस्ट से तो बचा मगर ग्रे लिस्ट में उसका नाम पहुंच गया।

आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह बड़ी असमंजस की स्थिति है। वह न तो एफ़आईटीएफ़ की कठोर कार्यवाही को सहन कर सकता है और न ही चरमपंथी संगठनों की नाराज़गी मोल ले सकता है।

ए.ए.नक़वी

नोटः पार्स टुडे का लेखक की राय से सहमत होना आवश्यक नहीं है।