कश्मीर क़ब्रिस्तान की तरह ख़ामोश है!
भारत से संबंध रखने वाले मानवाधिकार मामलों के वकील विरेंद्र गुरू द्वारा अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट में भारत प्रशासित कश्मीर को क़ब्रिस्तान की तरह ख़ामोश क़रार दिया है।
प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक़, अपनी 1,500-शब्दों पर अधारित रिपोर्ट में, विरेंद्र गुरू ने वीडियो और ऑडियो क्लिपों द्वारा भारत प्रशासित कश्मीर की ताज़ा स्थिति को बयान करने का प्रयास किया है। विरेंद्र गुरू की रिपोर्ट में बुद्धिजीवी प्रताप मेहता के हवाले से लिखा गया है कि उन्होंने द इकोनॉमिस्ट दिए एक साक्षात्कार में भारत प्रशासित कश्मीर की स्थिति के संबंध में बात करते हुए कहा था कि, कश्मीर को प्राप्त विशेष दर्जे को अचानक से समाप्त नहीं किया गया है, बल्कि पहले कश्मीर घाटी के मुसलमानों के ख़िलाफ़ भ्रम फैलाया गया और उसके बाद धारा 370 और 35-ए को ख़त्म किया गया है। उन्होंने कहा कि कश्मीर के केंद्र शासित राज्य में बंटने के बाद, कश्मीर के लोगों को सबसे पहले जिस बात का अनुभव हुआ है वह है असीमित सरकारी शक्ति को सहन करना।
विश्व बैंक से संबंध रखने वाले एक कश्मीरी, सलमान सोज़ ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम लिखे अपने पत्र में मोदी के उस दावे को ख़ारिज कर दिया कि जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीर से धारा 370 समाप्त करने का उद्देश्य इस इलाक़े में समृद्धि और विकास लाना है। सलमान सोज़ ने भारतीय प्रधानमंत्री को अपने पत्र के माध्यम से उनका ध्यान इस ओर खींचा कि भारत की 21.9% प्रतिशत ग़रीबी दर के बावजूद, कश्मीर में ग़रीबी का स्तर केवल 8.1% है और राज्य देश के 5 सबसे अच्छे विकासशील राज्यों में से एक है। इसी तरह, कश्मीर में वर्ष 2017 में मानव विकास दर 1.679 थी, जो भारत की राष्ट्रीय औसत 0.639 से कहीं बेहतर है।
श्रीनगर के एक वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ वानी ने कहा, "जनता को संचार के पूर्व युग में ले जाया गया है और वातावरण में हर ओर भय और अफवाहें हैं।" श्रीनगर में व्यापक विरोध की अपुष्ट रिपोर्टों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, "इस संबंध में अभी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि अभी क्या होना बाक़ी है"। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार कार्यालय ने भी कहा था कि उन्हें 'कश्मीर की स्थिति पर बहुत अधिक चिंता है। इस संबंध में न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि 5 अगस्त को कश्मीर को प्राप्त विशेष दर्जा समाप्त करने से पहले मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर नागरिकों और नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था।
स्थानीय अधिकारियों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक़, 5 अगस्त के बाद से अब तक कम से कम दो हज़ार कश्मीरी गिरफ़्तार हो चुके हैं जिनमें व्यापारी नेता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, निर्वाचित प्रतिनिधि, शिक्षक और 14 साल का एक छात्र भी शामिल है। गिरफ़्तार किए गए लोग अपने परिवार वालों और वकीलों से संपर्क नहीं कर सके, जबकि कोई नहीं जानता कि उन्हें कहां रखा गया है, जबकि उनमें से अधिकांश को आधी रात को उठाया गया है। इसके अलावा, भारत सरकार ने यह भी नहीं बताया कि गिरफ़्तार किए गए लोगों को किस जुर्म में क़ैद में रखा गया है और उन्हें कब तक हिरासत में रखा जाएगा? रिपोर्ट के अनुसार, कुछ लोगों को गुप्त तरीक़े से भारतीय वायु सेना के विमानों द्वारा लखनऊ, वाराणसी और आगरा की जेलों में रखे जाने की सूचना है।
इस बीच राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, व्यापक स्तर पर की गई गिरफ़्तारी मोदी सरकार की चरणबद्ध तरीक़े से तैयार की गई योजना का भाग थी, जिसे पिछले साल लॉन्च किया गया था। टीकाकारों के मुताबिक़, "कश्मीरियों को अपने घुटनों पर लाना कट्टरपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों का बहुत पुराना सपना था, क्योंकि यह भारत का एकमात्र मुस्लिम-बहुल राज्य था, जहां पाकिस्तान और भारत दोनों के समर्थक हैं।" इसके अलावा हिंदू बहुल भारत में राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए कश्मीर एक बड़ी रुकावट है और जिस बाधा को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने मिलकर कथित तौर पर दूर करने का प्रयास किया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब आने वाला समय ही बताएगा कि कश्मीर को लेकर मोदी सरकार की जो नीति है वह कश्मीरी संघर्षकर्ताओं के सामने कितनी सफल होती है। (RZ)