कश्मीर में क्यों बड़ी तादाद में युवा बंदूक़ उठा रहे हैं
कश्मीर में हिंसा बढ़ गयी है क्योंकि भारत की सत्ताधारी पार्टी ने विरोध प्रदर्शन और छापामारी के ख़िलाफ़ कठोर नीति अपनाई है।
कश्मीर के शोपियाँ ज़िले का 23 साल का सज्जाद अहमद बेग पिछले महीने एक दोपहर को अपने घर से भेड़ों का झुंड लेकर क़रीब के जंगल में गया। वह कभी नहीं लौटा।
सज्जाद की छापामार के रूप में ज़िन्दगी सिर्फ़ 7 दिन गुज़री। पिछले कुछ महीनों में मारे गए कई छापामार हाल में भर्ती हुए थे। कुछ तो, छापामार की हैसियत से कुछ दिन पुराने थे।
इस महीने श्रीनगर में एक छापामार हताहत हुआ जिसने पिछले महीने बंदूक़ उठायी थी। एक दूसरा जवान आदमी जिसने स्थानीय यूनिवर्सिटी में बिज़नेस ऐडमिनिस्ट्रेशन के विषय में पीएचडी में दाख़िला लिया था, ट्रेकिंग ट्रिप से ग़ायब हो गया, जिसके बारे में संदेह है कि वह भी छापामारों में शामिल हो गया है।
कश्मीर के संबंध में भारस सरकार की कठोर नीति
कश्मीर में सुरक्षा बल, छापामारों का इस इलाक़े से सफ़ाया करना चाहते हैं, लेकिन सज्जाद जैसे जवान धीरे-धीरे छापामार बन रहे हैं, क्योंकि वे अपने परिवार को भी भनक नहीं लगने देते।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, पिछले साल 139 कश्मीरी नौजवान छापामार बन गए।
कश्मीर के साथ बढ़ता बेगानों जैसा बर्ताव
जम्मू में राजनैतिक टीकाकार ज़फ़र चौधरी ने अलजज़ीरा से कहाः कश्मीर में राजनैतिक शून्य के बीच नई दिल्ली इस इलाक़े के संबंध में अभूतपूर्व स्तर पर संवैधानिक बदलाव कर रहा है। नई नीतियों का बड़े पैमाने पर असर सामने आ रहा है जैसे नए डोमिसाइल क़ानून से लोगों को गहरा धक्का लगा है।
कश्मीरियों को इस बात का डर है कि डोमिसाइल क़ानून भारत के सबसे बड़े मुस्लिम बाहुल क्षेत्र में डेमोग्रैफ़िक बदलाव के लिए है। इस क़ानून के तहत विगत में दूसरे राज्यों को लोगों को कश्मीर में बसना और ज़मीन ख़रीदना मना था। पिछले हफ़्ते 25000 बाहरी लोगों को इस विवादित इलाक़ें में रहने का रेज़िडेंट पर्मिट दिया गया। कश्मीर वह इलाक़ा है जिसके मालेकाना हक़ का पाकिस्तान भी दावा करता है।
मारे जाने वाले छापामारों की शवयात्रा निकालने पर रोक
छापामारों को आम लोगों का बड़ा समर्थन मिलता है और लड़ाई में मारे जाने वालों को शहीद माना जाता है और उनकी शव यात्रा में बड़ी तादाद में लोग शामिल होते हैं। कश्मीर के तराल क्षेत्र में 4 साल पहले पहले लोकप्रिय छापामार बुरहान वानी के मारे जाने पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। उनकी शव यात्रा में दसियों हज़ार की तादाद में लोग शामिल हुए थे। लेकिन अब भारतीय अधिकारी, मारे जाने वाले छापामारों का शव अपने क़ब्ज़े में लेकर सुदूर पहाड़ी इलाक़े में ख़ामोशी से दफ़्न करा देते हैं।
छापामार कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से, छापामार गुटों में शामिल होने वाले कश्मीरी नौजवानों की तादाद बढ़ रही है, क्योंकि उन्हें राजनैतिक हल की उम्मीद नज़र नहीं आ रही है।
हालिया बरसों में भारत-पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर सुकून भी ख़त्म हो गया है। सीमा पार शेलिंग, जिसमें बड़ी हद तक कमी आयी थी, वह मोदी के शासन काल में नई दिल्ली की बदली हुयी नीति की वजह से बहुत बढ़ गयी है। 2014 तक संघर्ष विराम के उल्लंघन की 457 घटनाएं हुयी थीं जो 2019 तक कई गुना बढ़ कर 3479 हो गयीं। (अलजज़ीरा के सौजन्य से)
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