भारतीय मुसलमानों के ख़िलाफ़ संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे लोगों की साज़िश!
भारत में वैसे तो आज़ादी के बाद से जबसे पाकिस्तान अलग हुआ है तब से इस देश में मौजूद कट्टरपंथी विचारधारा वाले संगठन किसी न किसी बहाने से मुसलमानों को टॉर्गेट करते रहे हैं। भारत में चाहे जिस भी पार्टी की सरकार रही हो हमेशा कहीं न कहीं मुसलमानों पर अत्याचार ज़रूर हुआ है। लेकिन वर्ष 2014 के बाद से भारतीय मुसलमानों के लिए सबसे कठिनाई भरे दौर की शुरूआत हुई है। मॉब लिंचिंग से लेकर कथित लव जेहाद तक यह वह विषय रहे हैं जिसका सहारा लेकर भारत के एक धर्म विशेष के लोगों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।
इसी तरह जब ख़ुद भारत की केंद्र सरकार मान चुकी है कि लव जेहाद नाम की कोई चीज़ है ही नहीं, तो फिर कुछ राज्य सरकारों को उस पर क़ानून लाने की क्यों जल्दी मची हुई है? उत्तर प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक की सरकारों ने घोषणा की है कि वह ‘लव जेहाद’ पर क़ाबू पाने के लिए क़ानून लाने जा रही हैं। भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अपने एक बयान में तो अजीबोग़रीब चेतावनी दे डाली है कि जो लोग ‘छद्म वेश में, चोरी-छुपे, अपना नाम छिपाकर, या अपना स्वरूप छिपाकर बहन, बेटियों की इज्ज़त के साथ खिलवाड़ करते हैं, अगर वे सुधरे नहीं तो ‘राम नाम सत्य है’ की यात्रा अब निकलने वाली है।’ इस तरह की भाषा और इस तरह का बयान कोई आम व्यक्ति या गली का गुंड़ा नहीं दे रहा है बल्कि यह वे लोग हैं जो संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हैं और जिन्होंने भारत के संविधान की सौगंध खाई है। लेकिन अफ़सोस यह है कि इसतरह के बयानों की आलोचना तो दूर की बात है बल्कि इसको सही ठहराते हुए इसपर समाचार चैनलों पर डिबेट भी होती है।

अब यहां पर प्रश्न यह उठता है कि जब खुद केंद्र सरकार ही मान चुकी है कि लव जेहाद नाम की कोई चीज़ है ही नहीं तो फिर कुछ राज्य सरकारों को उस पर कानून लाने की क्यों तुली हुईं हैं? कट्टरपंथी हिंदू संगठन इस पर आधिकारिक रूप से कुछ बोलने से बचते हैं। लेकिन उनकी सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाली विचारधारा का काफ़ी हद तक सही अनुमान उनके नेताओं के बयानों सोशल मीडिया पर व्याप्त संदेशों और कितनी ही अनाधिकारिक वेबसाइट्स की सामग्री से लगाया जा सकता है। सीधे शब्दों में उनका मानना है कि ‘लव जेहाद’ मुसलमानों का देश के विरुद्ध एक षड्यंत्र है। उनकी कल्पना में इसके माध्यम से मुसलमान हिंदुओं को यह बताना चाहते हैं कि वह अभी भी हिंदुओं की स्त्रियों को ‘उठा ले जाने’ में सक्षम हैं-अगर मध्य युग की तरह युद्धों में पराजित करके नहीं, तो प्रेम जाल में फंसा के ही सही! कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे विचार राष्ट्र और समाज के हितों के विरुद्ध सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का गर्हित कार्य कर रहे हैं और इसलिए इनका तत्काल कठोरतापूर्वक शमन आवश्यक है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि इस पूरे प्रकरण में जेहाद शब्द का प्रयोग करके जनता को डराया और भड़काया जा रहा है।

जानकारों का मानना है कि सरकारों को किसी काल्पनिक वस्तु पर क़ानून बनाने का अधिकार नहीं है। अगर ऐसे क़ानून बनाए जाते हैं तो यह विधायी अधिकारों का दुरुपयोग होगा।‘लव जेहाद’ जैसी काल्पनिक चीज़ की चर्चा करना भी विवाह जैसी क़ानून सम्मत व्यवस्था का सांप्रदायीकरण और अपराधीकरण दोनों है। यह अनैतिक है क्योंकि यह प्रेम जैसी पवित्र भावना को ग़ैर क़ानूनी ठहराने का कार्य करता है। इस सारे वितंडावाद के पीछे निहित राजनीतिक उद्देश्य मुसलमानों के सामाजिक अलगाव को उस सीमा तक ले जाना है, जहां वह उनके सामाजिक बहिष्कार में बदल जाए या देश के सामाजिक इकोसिस्टम में उनकी कोई अर्थपूर्ण भागीदारिता ही रह न जाए। जानकार कहते हैं कि कट्टरपंथी विचारधारा के लोग जानते हैं कि इस देश की तमाम पेचीदगियों के चलते वे भले ही अपनी कल्पना के ‘हिंदू राष्ट्र’ को एक राजनीतिक या भौतिक हकीकत न बना पाएं, लेकिन इस प्रकार के विषवमन से उसे एक सामाजिक यथार्थ तो बना ही सकते हैं। हमें इसी ख़तरे से सावधान रहना है। (RZ)