अंग्रेज़ों को भगाया, मानसिकता को नहीं, इसी का ख़मियाज़ा भुगत रहा भारत
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अंग्रेज़ों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए जिस दीर्घकालीन कामयाबी के लिए “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनायी थी लगता है उसके पीछे उनका यह पक्का विश्वास था कि उनकी साज़िश ज़रूर कामयाब होगी क्योंकि भारत के भविष्य के नेता स्वदेशी नहीं, अंग्रेज़ी मानसिकता के ही ग़ुलाम होंगे।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
May २५, २०२१ ०९:११ Asia/Kolkata
  • (सिर्फ़ प्रस्तुतिकरण के लिए है यह तस्वीर)
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अंग्रेज़ों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए जिस दीर्घकालीन कामयाबी के लिए “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनायी थी लगता है उसके पीछे उनका यह पक्का विश्वास था कि उनकी साज़िश ज़रूर कामयाब होगी क्योंकि भारत के भविष्य के नेता स्वदेशी नहीं, अंग्रेज़ी मानसिकता के ही ग़ुलाम होंगे।

सांप्रदायिक झगड़े यानी दंगे-फ़साद तब भारत में होते ही नहीं थे। सभी भारतीय चाहे हिन्दु हो या मुसलमान, हर बात को समान नज़र और नज़रिये से देखते और सभी घटनाओं को समान ढंग से ही स्वीकार करते और अपनाते थे। हिन्दु-मुस्लिम एकता पूरी तरह क़ायम रखने के लिए किसी को कुछ करने की ज़रूरत नहीं थी। दरअस्ल सदियों तक एकजुट रहने के कारण उनके संबंध स्थायी हो गए थे। अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि उस वक़्त सामाजिक वातावरण, यानी ताने-बाने में सांप्रदायिक टकरावों का कहीं कोई नामोंनिशां ही नहीं था। कह सकते हैं कि आज की तरह हिन्दु-मुस्लिम जैसे विभेदक टकराव का अस्तित्व ही नहीं था।

ईस्ट इंडिया कंपनी के अध्यक्ष मेंगल ने पार्लियामेंट में जो भाषण दिया था उसमें उन्होंने साफ़ साफ़ कहा थाः “ईश्वर ने हमें हिन्दुस्तान का विशाल राज्य इसलिए सौंपा है, क्योंकि हम वहाँ एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक ईसा मसीह का विजय का झंडा फहराएं। हमारा और आप सब का यह कर्तव्य है कि संपूर्ण भारत को ईसाई बनाने में अपनी पूरी ताक़त लगा दें।” इस भाषण का समर्थन करते हुए रॉबर्ट माउंट गुमरी ने कहा थाः “जब तक भारत में हमारा साम्राज्य क़ायम है, तब तक हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा अब बड़ा काम समूचे भारत को ईसाई बनाना है।”इसी भावना से प्रेरित होकर सन 1836 में मैकाले ने यह गर्वोक्ति की थी कि 30 बरसों में भारत में एक भी मूर्ति पूजक नहीं बचेगा।

अंग्रेज़ों ने दूसरा फ़ार्मूला हिन्दु से कम महत्व मुसलमालों को देने का अपनाया था ताकि दोनों के बीच पहले मनमुटाव बढ़े, जो आगे जाकर स्थायी दुश्मनी में तब्दील हो जाएगा। अंग्रेज़ों की यह योजना हर ऐंगल से निशाने पर लगती रही। इससे दंगे होने लगे, मार-काट होने लगी, क्योंकि दोनों के बीच रोटी-बेटी का संबंध कभी था ही नहीं और कभी हो भी नहीं सकता था।

आज भी हम साज़िश के जाल नहीं निकल पाए हैं, क्योंकि हमारे मन में गंदगी घर कर गयी है कि हम दोनों नदीं के दो छोर हैं, जो कभी एकसाथ नहीं आ सकते। दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे मन में बैठी उस गंदगी को स्थायी बनाने का कुचक्र रचने का कोई मौक़ा हमारे राजनेता चूकना नहीं चाहते। अभी पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में हुए विधान सभा चुनाव के दौरान यही तो कहा गया कि ममता बैनर्जी चुनाव इसलिए जीतीं, क्योंकि उन्हें मुसलमान मतदाताओं का समर्थन मिला और उस समुदाय के सारे वोट तृणमूल कॉन्ग्रेस को मिले।

किसी भी देश की जनता के भाग्य विधाता तो वहां की सरकार ही होती है, लेकिन, आज तक ऐसी कोई भी कोशिश किसी सरकार की ओर से की गयी नज़र नहीं आती जिसमें इन सामाजिक बुराइयों और ख़ामियों को दूर करने का कभी गंभीर प्रयास किया गया है। उल्टे ठंडी पड़ती आग में अक्सर घी डालने का काम ही सरकारें करती रहीं। चाहे वह केन्द्र सरकार रही हो या कोई राज्य सरकार। ऐसा लगता है, समस्या की जड़ में पानी के बजाए ज़हर डाला जाता है, ताकि उन्हें चुनावी लाभ मिल सके। इसलिए उन्हें नए-नए सपने दिखाए जाते हैं, जिसके दम पर उनका वोट सधता रहता है, वे जीतते रहे हैं और समाज में दुर्गन्ध को बरक़रार रखने में कामयाब रहते हैं।

अंग्रेज़ों ने दूरदर्शिता का दिखाते हुए जिस दीर्घकालीन कामयाबी के लिए “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनायी थी और उसी के साथ मैकाले ने तीस बरसों में भारत के सभी मूर्ति पूजकों के ख़ुद ब ख़ुद ख़त्म होने का आत्मविश्वास दिखाया था, लगता है उसके पीछे उनका यह पक्का विश्वास था कि उनकी साज़िश ज़रूर कामयाब होगी, क्योंकि भारत के भविष्य के नेता स्वदेशी नहीं, अंग्रेज़ी मानसिकता के ही ग़ुलाम होंगे।  (साभारः जनसत्ता)