ईरान के ख़िलाफ मानवाधिकार की रिपोर्ट राजनीति से प्रेरित हैः विदेशमंत्रालय
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विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता ने ईरान में मानवाधिकार की स्थिति के बारे में राष्ट्रसंघ की महासभा की हालिया रिपोर्ट को राजनीति से प्रेरित और न्याय से परे बताया है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jun २२, २०२२ १०:२९ Asia/Kolkata
  • ईरान के ख़िलाफ मानवाधिकार की रिपोर्ट राजनीति से प्रेरित हैः विदेशमंत्रालय

विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता ने ईरान में मानवाधिकार की स्थिति के बारे में राष्ट्रसंघ की महासभा की हालिया रिपोर्ट को राजनीति से प्रेरित और न्याय से परे बताया है।

सईद ख़तीबज़ादे ने कहा कि जैसाकि बारमबार बल देकर कहा गया है कि इस प्रकार की रिपोर्टें राजनीति से प्रेरित और न्याय से परे होती हैं और इस प्रकार की रिपोर्टों से मानवाधिकारों की स्थिति को बेहतर बनाने में कोई सहायता नहीं मिलेगी। इसी प्रकार सईद ख़तीबज़ादे ने कहा कि खेद के साथ कहना पड़ता है कि राष्ट्रसंघ के महासचिव के नाम से यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई है और इसके दावे का आधार अविश्वसनीय है।  

वास्तविकता यह है कि काफी समय पहले से मानवाधिकार दूसरे देशों पर दबाव डालने का हथकंडा बन गया है। रोचक बात यह है कि इस प्रकार की रिपोर्टें उन देशों के दबाव और दिशा निर्देशन में प्रकाशित होती हैं जिनका मानवाधिकार के हनन में लंबा इतिहास है। उदाहरण के तौर पर आप अमेरिका और ब्रिटेन के क्रियाकलापों को देख सकते हैं। अमेरिका ने वर्ष 2001 में 11 सितंबर की घटना के बाद अफगानिस्तान पर हमला करके उस पर कब्ज़ा कर लिया और लगभग 20 वर्षों तक अमेरिका और नैटो के सैनिक अफगानिस्तान में मौजूद रहे। अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने और आतंकवाद से मुकाबला करने के बहाने इस देश पर हमला किया था परंतु लगभग दो दशकों तक अतिग्रहणकारी सैनिक अफगानिस्तान में मौजूद रहे वहां न तो शांति स्थापित हुई और न ही आतंकवाद का सफाया हुआ। यही नहीं अफगानिस्तान के जिन क्षेत्रों में विदेशी सैनिक तैनात थे वहां मादक पदार्थों की खेती और तस्करी में ध्यान योग्य वृद्धि हो गयी।

सवाल यह पैदा होता है कि इतने वर्षों तक अमेरिका की अगुवाई में विदेशी सैनिक अफगानिस्तान में जो मौजूद रहे उसकी उपलब्धि क्या रही? जानकार हल्कों का कहना है कि अफगानिस्तान की तबाही व बर्बादी के सिवा इस उपस्थिति की कोई अन्य उपलब्धि नहीं रही। अफगानिस्तान के लोग अपनी बहुत सी समस्याओं की जड़ इसी उपस्थिति में देख रहे थे इसलिए उन्होंने अपने देश में अतिग्रहणकारी सैनिकों की उपस्थिति के खिलाफ कई बार प्रदर्शन किया था।

अमेरिका और पश्चिमी देश स्वंय को मानवाधिकारों का रक्षक व ठिकेदार समझते हैं। अमेरिका से पूछा जाना चाहिये कि वह अफगानिस्तान की जो सम्पत्ति डकार गया वह मानवाधिकार के किस खाते में आता है? अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जो यह कहा है कि अफगानिस्तान की सम्पत्ति का आधा भाग 11 सितंबर की घटना से प्रभावित अमेरिकी परिजनों को दिया जायेगा और शेष अमेरिका आने वाले अफगान शरणार्थियों को दिया जायेगा। तो उनसे यह पूछा जाना चाहिये कि अफगानिस्तान की राष्ट्रीय सम्पत्ति किस तर्क के आधार पर 11 सितंबर की घटना में प्रभावित होने वाले अमेरिकी परिजनों को दी जायेगी? क्या 11 सितंबर की घटना का ज़िम्मेदार अफगान जनता या वहां के लोग हैं? रोचक बात है कि 11 सितंबर की घटना के संबंध में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था उनमें से आधे से अधिक का संबंध सऊदी अरब से है और उसके खिलाफ अमेरिकी सरकारों ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की।

बहरहाल अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, यमन और दूसरे देशों में अमेरिका और उसकी हां में हां मिलाने वाले देशों व शासनों के क्रिया कलापों पर ध्यान दिया जाये तो बहुत अच्छी तरह यह स्पष्ट हो जायेगा कि मानवाधिकारों का वास्तविक रक्षक कौन है, मानवाधिकारों की रक्षा का राग अलापने से कोई मानवाधिकारों का रक्षक नहीं बन जाता है। MM