ईरान की सड़कों पर फिर उमड़ा जनसैलाब+ फ़ोटोज़+ आडियो
आज ईरान के छोटे बड़े शहरों, क़स्बों और गांवों में जनता एक बार फिर सड़कों पर निकली और उसने इस्लामी व्यवस्था के प्रति अपनी वफ़ादारी का एलान किया। ईरान के इतिहास में 9 दै माह यानी 30 दिसम्बर का दिन बहुत ही यादगार है।
30 दिसम्बर 2009 का दिन ईरान की इस्लामी क्रांति के इतिहास में बहुत अहम दिन है। इस दिन ईरान की जनता ने उदाहरणीय जागरूकता का परिचय देते हुए बड़ी मज़बूती और दृढ़ता के साथ देश भर में सड़कों पर बाहर निकल कर इस्लामी क्रांति, इस्लामी शासन व्यवस्था, इमाम ख़ुमैनी और आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई से अपनी वफ़ादारी का संकल्प दोहराया जिसका नतीजा यह हुआ कि इस्लामी क्रांति और इस्लामी शासन पर वार करने की दुश्मन की साज़िश नाकाम हो गई।
यहां पर यह सवाल पैदा होता है कि 30 दिसम्बर को क्या कारनामा हुआ था और यह दिन कैसे इतिहास में हमेशा के लिए यादगार बन गया? ईरानी वर्ष 1388 हिजरी शम्सी बड़ा चुनौतियां वाला साल रहा। इस साल ईरान में राष्ट्रपति चुनाव हुए जिसमें पूरी पारदर्शिता दिखाई गयी और जनता ने इस चुनाव में बढ़ चढ़कर भाग लिया। जनता ने अपने अपने पसंदीदा उम्मीदर के पक्ष में मतदान किया जैसा कि आम तौर पर हर देश की जनता करती है।
इस्लामी क्रांति और इस्लामी शासन व्यवस्था के लिए जब इतने बड़े पैमाने पर मतदान हुआ तो दुश्मन हैरान व परेशान हो गया कि अब एक बार फिर जनता के आगे उसकी एक भी न चलेगे। मतगणना शुरू हुई और बड़े जोश व ख़रोश के साथ शुरू हुई मगर कुछ उम्मीदवारों और उनके समर्थकों ने आरंभिक परिणाम आते ही चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि देश में लोकतंत्र का इतना बड़ा और उत्साह से भरा त्योहार विवाद की भेंट चढ़ने लगा।
कुछ लोगों ने इसके बाद क़ानून अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया। चुनाव परिणामों पर एतेराज़ की क़ानूनी प्रक्रिया अपनाने के बजाए उन्होंने तेहरान की सड़कों पर हंगामा शुरू कर दिया जिससे दुश्मन मीडिया को प्रोपैगंडा करने का मौक़ा भी मिल गया।
ईरान में राष्ट्रपति चुनावों और उसके बाद होने वाले हंगामों को कई महीने गुज़र गए मगर चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाने वाले लगातार सड़कों पर हंगामे करते रहे। उनकी कोशिश थी कि सरकार और पूरी व्यवस्था पर दबाव डालें और अपनी मर्ज़ी के फ़ैसले करवाएं।
उपद्रव करने वालों के अगुवा नेताओं ने जब देखा कि उनके समर्थक क़ानूनी दायरे को पार कर रहे हैं बल्कि धार्मिक नियमों को तोड़ते हुए जनता की भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं तब भी उन्होंने ख़ामोशी ही अख़तियार किए रखी। यही नहीं वे कभी कभी तो इन हंगामों का तर्क देने की भी कोशिश कर रहे थे।
इसी दौरान मोहर्रम की दसवीं पड़ी जब इमाम हुसैन का ग़म पूरा ईरान मनाता है और विश्व स्तर पर इमाम हुसैन को श्रद्धांजलि दी जाती है। इस दिन सड़कों पर उपद्रव करने वालों ने हुसैनी मातमदारों और इमाम हुसैन से जुड़े प्रतीकों पर हमले शुरू कर दिए। जब आशूर के दिन हंगामे हुए और इमाम हुसैन से जुड़े प्रतीकों का अनादर हुआ तो फिर ईरान की जनता के सब्र का पैमाना टूट गया। पूरे ईरान में जनता सड़कों पर निकल पड़ी। यह दिन 30 दिसम्बर 2009 का दिन था
इस्लामी क्रांति के नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई ने इस महान कारनामे की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह ईरान की मोमिन और ग़ैरतमंद जनता की जागरूकता और होशियारी का दृश्य था जिसने दुश्मन के अंदाज़ों और समीकरणों को उलट पलट कर रख दिया। (AK)
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