ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की मनमानी, अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों पर सीधा हमला
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संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत ने गुरुवार को सुरक्षा परिषद की बैठक में जिसका शीर्षक अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की हिफ़ाज़त के लिए क़ानून के प्रभुत्व की मज़बूती था, कहा कि इस्लामी गणराज्य ईरान जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ के स्वाधीन देशों के ख़िलाफ़ अमरीका की मनमानी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क़ानून के प्रभुत्व को कमज़ोर करने और संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र पर प्रहार के अर्थ में है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jan १३, २०२३ १२:३५ Asia/Kolkata
  • ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की मनमानी, अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों पर सीधा हमला

संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत ने गुरुवार को सुरक्षा परिषद की बैठक में जिसका शीर्षक अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की हिफ़ाज़त के लिए क़ानून के प्रभुत्व की मज़बूती था, कहा कि इस्लामी गणराज्य ईरान जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ के स्वाधीन देशों के ख़िलाफ़ अमरीका की मनमानी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क़ानून के प्रभुत्व को कमज़ोर करने और संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र पर प्रहार के अर्थ में है।

ईरान के राजदूत ने आगे कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ के कुछ सदस्य देशों विशेष रूप से अमरीका की तरफ़ से लगातार संयुक्त राष्ट्र संघ की शक्ति और अधिकारों का दुरुपयोग किया जा रहा है और इस संस्था को स्वाधीन देशों पर दबाव डालने और ग़ैर क़ानूनी राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

अमरीका की नीतियों के आलोचक देश शुरू से अमरीका की मनमानी पर एतेराज़ करते आ रहे हैं। यह मनमानी संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क़ानून के प्रभुत्व के लिए ख़तरा समझी जाती है इसी तरह इससे अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के क्षेत्र में आपसी सहयोग के रास्ते में रुकावट भी पैदा हो रही है। पिछले दो दशकों के दौरान अमरीका ने अपनी इसी मनमानी को जारी रखते हुए इराक़ पर हमला किया, अफ़ग़ानिस्तान पर सैनिक चढ़ाई की और सीरिया में आतंकी संगठनों का समर्थन करके वहां की क़ानूनी सरकार को गिराने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया जबकि यह सारी हरकतें पश्चिमी एशिया में अशांति व अस्थिरता फैलने और आतंकवाद के पनपने का कारण बनीं।

अमरीका की यह जंगे वेस्ट एशिया में लाखों इंसानों की जान ले चुकी हैं जबकि दाइश जैसे आतंकी संगठनों को अमरीका की तरफ़ से मिलने वाली मदद के नतीजे में सीरिया और इराक़ में बड़े भयानक अपराध देखने में आए जबकि अब यह संकट अफ़ग़ानिस्तान को भी अपनी लपेट में ले चुका है।

वाशिंग्टन ने हमेशा ही और ख़ास तौर पर डोनल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में एकपक्षीय रवैए और मनमानी को ख़ूब बढ़ावा दिया। इस दौर में अमरीका चीन के ख़िलाफ़ राजनैतिक व व्यापारिक टकराव में व्यस्त रहा साथ ही उसने अपने घटक यूरोपीय देशों को भी निशाना बनाया नतीजा यह हुआ कि नैटो के तारे बंधे हुए यह देश एक दूसरे से दूर चले गए। जो बाइडन के शासनकाल में भी अमरीका मनमानी पर ही अड़ा हुआ है।

इसका उदाहरण यूक्रेन जंग के बहाने रूस के ख़िलाफ़ अमरीका की कार्यवाहियों में देखा जा सकता है। यहां अमरीका की मनमानी के रूप में उसकी एकपक्षीय पाबंदियों का नाम लिया जा सकता है। इस समय अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा प्रतिबंध लगाने वाला देश बन गया है जो अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए दूसरे देशों पर पाबंदियों के ज़रिए भारी दबाव डाल रहा है।

अमरीका वैसे तो राजनैतिक, व्यापारिक, सुरक्षा, यहां तक कि मानवाधिकार जैसे बहाने पेश करके अपने प्रतिद्वंद्वी देशों पर पाबंदियां लगाता है मगर इसका असली लक्ष्य अमरीका के स्वार्थों को पूरा करना है। पिछले चार दशकों के दौरान अमरीका ने ईरान के ख़िलाफ़ बड़ी कठोर कार्यवाहियां कीं और भयानक पाबंदियां लगाईं। ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका मनोवैज्ञानिक व प्रचारिक युद्ध भी करता रहा है।

ईरान के राजदूत ने कहा कि अमरीका का परमाणु डील से निकल जाना और ईरान पर एकपक्षीय रूप से पाबंदिया लगाना सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 का खुला उल्लंघन है।

ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की नीतियां और एकपक्षीय कार्यवाहियां बेनतीजा साबित हुईं लेकिन वाशिंग्टन अब भी अपना यही ग़ैर क़ानूनी रवैया जारी रखने पर अड़ा हुआ है। इतना ही नहीं बाइडन के शासन काल में अमरीका ईरान के ख़िलाफ़ हाइब्रिड जंग आगे बढ़ा रहा है।

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