ईरान के इतिहास में क्यों 5 जून है अहम?
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15 ख़ुरदाद बराबर 5 जून 1963 में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने अपना ऐतिहासिक आंदोलन आरम्भ किया था।
(last modified 2023-06-04T22:38:13+00:00 )
Jun ०५, २०२३ ०४:०४ Asia/Kolkata
  • ईरान के इतिहास में क्यों 5 जून है अहम?

15 ख़ुरदाद बराबर 5 जून 1963 में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने अपना ऐतिहासिक आंदोलन आरम्भ किया था।

15 ख़ुरदाद को इमाम ख़ुमैनी नें मदरसए फ़ैज़िया में अपने सम्बोधन में शाही शासन के विरुद्ध, उसकी सच्चाई से परदा उठाया और उसके चेहरे पर पड़ी नक़ाब को उलट दिया और उसके बाद शाही शासन के एजेन्टों ने इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के घर पर हमला करके उन्हें गिरफ़्तार कर लिया।

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की गिरफ़्तारी के बाद क़ुम और तेहरान समेत देश के विभिन्न भागों में शाही हुकूमत के विरुद्ध बहुत तेज़ी के साथ प्रदर्शन किये गए। प्रदर्शन के दौरान शाही शासन की ख़ुफ़िया एजेंसी सावाक ने क़ुम शहर में स्थित मदरसए फ़ैज़िया पर हमला करके बड़ी संख्या में धार्मिक छात्रों को शहीद और दसियों लोगों को गिरफ़्तार कर लिया था।

15 ख़ुर्दाद के आंदोलन की मुख्य पहचान यह है कि यह आंदोलन ईरान में अमरीकी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ हुआ था। 19 अगस्त 1953 का सैन्य विद्रोह और उसके बाद राजनीतिक घटनाओं का क्रम जिसमें साम्राज्यवादी शक्तियों के हस्तक्षेप से लेकर केपिचलेशन क़ानून शामिल है। 5 जून 1963 को इस आंदोलन से ईरान में अत्याचारी शाही शासन के पतन के लिए भूमि प्रशस्त हुई।

15 ख़ुर्दाद आंदोलन के कारणों पर नज़र डालने से पता चलता है कि उस समय के राजनीतिक व सामाजिक हालात का इस आंदोलन के जन्म लेने में बहुत बड़ा रोल था। इस मामले का सबसे अहम आयाम, 1954 के सैन्य विद्रोह के बाद ईरान के संबंध में अमरीकी विदेश नीति थी। 1954 के सैन्य विद्रोह में डाक्टर मुसद्दिक़ की सरकार का तख़्ता पलटा गया ताकि अमरीका व ब्रिटेन की इच्छा से ईरान में शाह का अत्याचारी शासन मज़बूत हो।

इमाम ख़ुमैनी ने कहा था कि 15 ख़ुरदाद आंदोलन को भुलाया नहीं जा सकेगा, उसकी बरसी पर उसे पहले से भी ज़्यादा याद किया जाना चाहिए। 15 ख़ुर्दाद का दिन 12 मोहर्रम को पड़ा था, यह विदेशी एजेंटों और वामपंथी और दक्षिणपंथी उपनिवेशवाद के एजेंटों के ख़िलाफ़ ईरानी राष्ट्र के साहसपूर्ण संघर्ष का एक जीवित दस्तावेज़ था। (AK)

 

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