ईरान के लिए क्यों अहम हैं अफ़्रीक़ी देश?
इस्लामी गणतंत्र ईरान के राष्ट्रपति तीन अफ़्रीक़ी देशों केन्या, युगांडा और ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपतियों के आधिकारिक निमंत्रण पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए बुधवार को तेहरान से केन्या के लिए रवाना हुए।
अफ़्रीका की यात्रा पर ईरान के राष्ट्रपति सैयद इब्राहीम रईसी का पहला गंतव्य केन्या है, उसके बाद वह युगांडा और ज़िम्बाब्वे के लिए रवाना होंगे। 11 साल बाद ईरान के राष्ट्रपति की यह पहली अफ़्रीक़ा यात्रा है।
केन्या के लिए रवाना होने से पहले इस्लामी गणतंत्र ईरान के राष्ट्रपति ने मेहराबाद हवाई अड्डे पर पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस्लामिक क्रांति की सफलता के बाद इस्लामी गणतंत्र ईरान और अफ़्रीक़ी देशों के बीच संबंध विभिन्न क्षेत्रों में अच्छे रहे हैं लेकिन समय गुज़रने के साथ ही कुछ संबंधों में रुकावटें आई हैं विशेषकर पिछले दशकों के दौरान लेकिन आज अफ्रीका में मौजूद विशाल धन और प्राकृतिक और खनिज संसाधनों के कारण और अफ्रीकी देशों में कई प्रतिभाओं को ध्यान में रखते हुए इन क्षमताओं का आदान-प्रदान हो सकता है।
ईरान की वर्तमान सरकार ने अगस्त 2021 में सत्ता संभाली और उसके बाद उसने एक प्रयास शुरू किया है जिसका मुख्य उद्देश्य दुनिया में उपेक्षित क्षमताओं पर विशेष ध्यान देना है ख़ासतौर पर ट्रांस-वेस्टर्न क्षमताएं जिन पर अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिम की नीतियों का सबसे कम प्रभाव है।
पड़ोसी देशों, यूरेशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में ये क्षमताएं पायी जाती हैं और इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में उपस्थिति से विदेशी निवेश को आकर्षित किया जा सकता है और उसे ज़मीन पर लागू किया जा सकता है।
केन्या को पूर्वी अफ़्रीक़ा के महत्वपूर्ण देशों में से एक और इस महाद्वीप का प्रवेश द्वार माना जाता है इसलिए इस देश के साथ विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में संबंधों का विस्तार, अफ़्रीक़ी महाद्वीप के पूर्वी क्षेत्र ईरान की उपस्थिति बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कारक साबित हो सकता है।
ईरान और केन्या के बीच संबंधों की शुरुआत 1971 से हुई। इथियोपिया और सोमालिया के बीच शत्रुता और संघर्ष तथा सोमालीयाई विद्रोहियों को पहलवी शासन के समर्थन के बाद 1977 में केन्या के साथ ईरान के संबंध टूट गए थे।
1982 में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद नैरोबी के साथ तेहरान के संबंध फिर से शुरू हुए। ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद यद्यपि हमने दोनों देशों के अधिकारियों का एक-दूसरे के देशों में दौरा देखा लेकिन व्यवहार में आर्थिक संबंधों में ज्यादा उछाल नहीं आया, जिसका मुख्य कारण है केन्या पर ईरान के साथ संबंधों को विकसित न करने का दबाव था। उस समय केन्या पश्चिम के राजनीतिक सहयोगियों के जिरगा के तौर पर काम कर रहा था।
केन्या, यूरोप और एशिया तक पहुंचने के लिए ईरान की परिवहन लाइनों का उपयोग करने में भी रुचि रखता है जबकि केन्या ईरानी औद्योगिक वस्तुओं के लिए एक अच्छा बाज़ार और जल संसाधन और उपजाऊ भूमि होने के कारण, यह क्षेत्र से बाहर खेती के लिए ईरान के लक्ष्यों में से एक हो सकता है।
उम्मीद है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान के राष्ट्रपति की केन्या यात्रा के दौरान, दोनों देशों के बीच सहयोग के लिए नए समझौतों और अनुबंधों पर ईरानी और केन्याई अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। (AK)
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