ईरान की प्रगति का सबसे बड़ा राज़ क्या है?
ईरान की नौसेना ने नये रक्षा हथियारों व संसाधनों का अनावरण किया है। ईरान की नौसेना ने जिन मिसाइलों, ड्रोनों और इलेक्ट्रानिक संसाधनों का अनावरण किया है उन सबका निर्माण देश के रक्षा उद्योग में ईरानी वैज्ञानिकों के परिश्रम से किया गया है।
अभी सिपाहे पासदारान आईआरजीसी ने ईरान के बुमूसा द्वीप में जो नौसैनिक अभ्यास किया है उससे कुछ नये रक्षा हथियारों का परीक्षण किया है। ईरान की नौसेना के पास इस समय 300 किलोमीटर से लेकर 1000 किलोमीटर दूरी तक मार करने वाले क्रूज़ मिसाइल हैं जिससे नौसेना की ताकत में काफी वृद्धि हो गयी है।
अभी सिपाहे पासदारान आईआरजीसी ने बुमूसा द्वीप में जो सैनिक अभ्यास किया है उसमें पहली बार क्रूज़ मीसाइल क़दीर और बैलेस्टिक मिसाइल फत्ह का परीक्षण किया गया।
सिपाहे पासदारान ने जिन रक्षा संसाधनों व हथियारों का अनावरण किया है वे इस बात के सूचक हैं कि ईरान रक्षा के क्षेत्र में भी ध्यान योग्य प्रगति कर रहा है। साथ ही इस प्रगति ने दर्शा दिया है कि तेहरान के खिलाफ प्रतिबंध और दुश्मनों के दबाव ईरान की प्रगति के मार्ग की बाधा नहीं बन सके हैं।
रोचक बात यह है कि न केवल रक्षा बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में ईरान ध्यान योग्य प्रगति कर रहा है और ईरान की प्रगति को रोकने के लिए दुश्मन विभिन्न बहानों व निराधार आरोपों के माध्यम से तेहरान के खिलाफ प्रतिबंध लगाते हैं और इन प्रतिबंधों का सबसे मुख्य लक्ष्य ईरान को प्रगति करने से रोकना है परंतु नैनो और परमाणु तकनीक जैसे जटिल क्षेत्रों में ईरान की उल्लेखनीय प्रगति ने दुश्मनों को हतप्रभ कर रखा है और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि ईरान को प्रगति करने से कैसे रोकें।
ईरान को प्रगति से रोकने के लिए ही ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों को शहीद किया गया परंतु किसी भी क्षेत्र में देश की प्रगति नहीं रुकी है और रक्षा उद्योग के क्षेत्र में वह आत्म निर्भर हो चुका है।
विभिन्न क्षेत्रों में ईरान की प्रगति का एक राज़ व कारण यह है कि वह देश के अंदर मौजूद संभावनाओं और देश के मेधावी व प्रतीभाशाली युवाओं की क्षमताओं से लाभ उठा रहा है इस प्रकार से कि रक्षा और ग़ैर रक्षा क्षेत्र की बहुत सी ज़रूरतों का निर्माण देश के भीतर किया जा रहा है और अमेरिका और दुश्मनों के एकपक्षीय प्रतिबंधों से उन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ रहा है।
यह उस स्थिति में है जब ईरान को इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से ही प्रतिबंधों का सामना रहा है और हालिया वर्षों में उसे कड़ा से कड़ा बना दिया गया है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह सोचकर ईरान के खिलाफ कड़े से कड़े प्रतिबंध की नीति अपनाई थी कि ईरान इन प्रतिबंधों के सामने घुटने टेक देगा और वाशिंग्टन की वर्चस्ववादी इच्छाओं व मांगों को मान लेगा परंतु कई वर्षों का समय बीत गया और ड्रम्प की सत्ता से विदाई भी हो गयी मगर ईरान वाशिंग्टन की वर्चस्ववादी नीतियों के समक्ष नहीं झुका।
जानकार हल्कों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अगर ईरान के खिलाफ कड़ा से कड़ा प्रतिबंध लगाने से पहले ईरानी इतिहास का थोड़ा सा अध्ययन कर लिया होता तो वे कभी भी ईरान के संबंध में इस प्रकार की विफल नीति न अपनाते। इस प्रकार से कि आज स्वयं अमेरिकी अधिकारी स्वीकार कर रहे हैं कि तेहरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की नीति विफल रही है और उसका कोई परिणाम नहीं निकला है। MM
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