ग़ज़्ज़ा युद्ध और ईरान
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ग़ज़्ज़ा युद्ध को लेकर ईरान का दृष्टिकोण आरंभ से ही बहुत स्पष्ट रहा है।
(last modified 2023-10-25T04:54:10+00:00 )
Oct २५, २०२३ १०:२४ Asia/Kolkata

ग़ज़्ज़ा युद्ध को लेकर ईरान का दृष्टिकोण आरंभ से ही बहुत स्पष्ट रहा है।

ग़ज़्ज़ा युद्ध को अब 18 दिन पूरे हो चुके हैं।  एसे में ग़ज़्ज़ा युद्ध के बारे में ईरान की जो नीति रही है वह इस प्रकार से है।

पिछले 18 दिनों के दौरान अलअक़सा तूफान आपरेशन के बारे में ईरान की ओर से यही कहा जाता रहा है कि यह ज़ायोनियों के अत्याचारों की प्रतिक्रिया है।  दूसरे शब्दों में  ज़ायोनियों के लगातार अत्चारों के मुक़ाबले में फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध कर्ताओं के पास इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग रह ही नहीं गया था। 

इस बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कह चुके हैं कि अलअक़सा तूफान आपरेशन, ज़ायोनियों के क्रियाकलापों का ही परिणाम है।  जब अत्याचार अपनी सीमा को पार कर जाते हैं तो फिर एसा ही होता है। 

दूसरी बात यह है कि ग़ज़्ज़ा में जारी जनसंहार, ज़ायोनी अपारथाइड है।  ग़ज़्ज़ा मे अबतक कम से कम पांच हज़ार आठ सौ फ़िलिस्तीनी शहीद हो चुके हैं जिनमें आधे से अधिक बच्चे हैं।  इससे पता चलता है कि अवैध ज़ायोनी शासन, फ़िलिस्तीनियों के जातीय सफाए का इच्छुक है।  इसीलिए उसने ग़ज़्जा में बिजली और पानी की आपूर्ति तक को बंद कर दिया है।  ग़ज़्ज़ा के लिए मानवताप्रेमी सहायता के नाम पर जो कुछ भेजा जा रहा है उसकी राह मे भी यह शासन बाधाएं डाल रही है।  इस बारे में ईरान के संसद सभापति क़ालीबाफ ने इस्लामी देशों के संसद सभापतियों को भेजे पत्र में लिखा है कि ग़ज़्ज़ा युद्ध, ज़ायोनी अपारथाइड का खुला नमूना है। 

इस्लामी गणतंत्र ईरान जहां पर अलअक़सा आपरेशन को ज़ायोनी अत्याचारों की प्रतिक्रिया के रूप में देखता है वहीं पर वह इस बात पर भी लगातार बल दे रह है कि मानवप्रेमी सहायता के रूप में ग़ज़्ज़ा के लिए अधिक से अधिक सामग्री भेजी जाए।  तेहरान के हिसाब से संयुक्त राष्ट्रसंघ और विश्व की शक्तियों को ग़ज़्ज़ा युद्ध रुकवाने के लिए अवैध ज़ायोनी शासन पर अधिक से अधिक दबाव डालना चाहिए।  इस बारे में ईरान के राष्ट्रपति सैयद इब्राहीम रईसी ने कहा है कि ग़ज़्ज़ा की निर्दोष जनता के विरुद्ध ज़ायोनियों के बढ़ते अत्याचारों और हमलों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की ज़िम्मेदारियों को अधिक बढ़ा दिया है। 

ग़ज़्ज़ा युद्ध के संदर्भ में ईरान की ओर एक अन्य विषय की बारंबार आलोचना की जा रही है और वह है इसपर कुछ देशों की ख़ामोशी।  किसी भी स्वतंत्र सरकार के अधिकारी कभी भी ग़ज़्ज़ा जैसी स्थिति पर मौन धारण नहीं कर सकते क्योंकि यह एक मानवीय मामला है।  हज़ारों निर्दोष फ़िलिस्तिनियों की हत्याओं और उनके घरों पर बमबारी को देखकर ख़ामोश रहना वास्तव में नाइंसाफ़ी है। 

पश्चिमी शक्तियों ने जहां इसपर मौन धारण कर रखा है वहीं पर अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के राष्ट्राध्यक्षों ने अवैध ज़ायोनी शासन की यात्राएं करके फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध इस शासन के समर्थन को दोहराया है।  इस संदर्भ में ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नासिर कनआनी कहते हैं कि घरों, अस्पतालों, स्कूलों, मस्जिदों, चर्च और एंबुलेंसों पर बमबारी के बावजूद कोई भी न्याय प्रिय व्यक्ति इसपर मौन धारण नहीं कर सकता जबकि एसा किया जा रहा है।

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