ग़ज़्ज़ा की मानव त्रासदी से ध्यान भटकाने की कोशिश
संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा की तीसरी समिति ने ईरान में मानवाधिकारों पर एक नए प्रस्ताव को ऐसी हालत में मंजूरी दी कि जब इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान वालों की संख्या, विरोध में मतदान करने वालों और अनुपस्थित रहने वाले सदस्यों की तुलना में कम थी।
इस्लामी गणतंत्र ईरान के ख़िलाफ़ कनाडा द्वारा पेश किए गये प्रस्ताव को बुधवार को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा की तीसरी समिति ने मंजूरी दे दी।
इस प्रस्ताव के पक्ष में 80 देशों ने वोट डाले जबकि 29 देशों ने विरोध में वोट डाले और मतदान के समय 65 देश अनुपस्थित थे। वास्तव में यह कहा जा सकता है कि दुनिया के 94 देश इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे।
इस प्रस्ताव का मुख्य फोकस ईरान में पिछले साल हुए दंगे थे और इस में दावा किया गया था कि ईरान में महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। दूसरा मुद्दा कनाडा के बारे में है जो हर साल ईरान के ख़िलाफ़ ऐसा प्रस्ताव पेश करता है।
कनाडा एक ऐसा देश है जिसका मानवाधिकार के क्षेत्र में काला रिकॉर्ड रहा है। ईरान के मानवाधिकार मुख्यालय ने कनाडा की इस कार्रवाई के जवाब में एक बयान जारी किया और कहा है कि 2021 में कनाडा में 34 हज़ार 200 से अधिक बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गईं जो पिछले वर्ष की तुलना में 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है।
यही नहीं कनाडा की जेलों में लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं स्थानीय महिलाएं हैं जो काल कोठरियों में अधिक समय बिताती हैं और रिहाई के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना करती हैं।
कनाडा की 27.3 प्रतिशत बेघर आबादी, महिलाओं की है जबकि हर रात, 6 हज़ार महिलाएं जिनमें ज़्यादातर बच्चों के साथ होती हैं, आपातकालीन आश्रयों में शरण लेती हैं। 96 प्रतिशत बेघर महिलाओं ने किसी न किसी प्रकार के यौन उत्पीड़न, चोरी, अपमान और धमकियों का सामना किया है।
ईरान के ख़िलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा की तीसरी समिति में कनाडा और पश्चिमी देशों की कार्रवाई ऐसी स्थिति में है कि जब दुनिया ग़ज़्ज़ा की जनता ख़ासकर बच्चों और महिलाओं के ख़िलाफ़ ज़ायोनी शासन के नरसंहार और युद्ध अपराधों को पिछले 40 दिन से अधिक समय से देख रही है।
इन सबके बावजूद ग़ज़्ज़ा में मानवाधिकार के संबंध में चिंताओं की कोई ख़बर ही नहीं है और आपराधी ज़ायोनी शासन को हर तरह की छूट हासिल है।
इस्लामी गणतंत्र ईरान के मानवाधिकार मुख्यालय के बयान में इस संदर्भ में यह भी कहा गया है कि दुर्भाग्य से मानवाधिकारों का पहले से कहीं अधिक राजनीतिकरण किया गया है और इस बारे में दोहरे मानदंड और भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण दुनिया में फैले हुए हैं।
ग़ज़्ज़ा पट्टी में ज़ायोनी शासन के व्यापक अपराध जो तरफ़ मानवता के विरुद्ध अपराधों, युद्ध अपराधों, नरसंहार और नस्लीय व जातीय सफ़ाए की निशानी है वहीं दूसरी ओर मानवाधिकारों के मुद्दे पर चयनात्मक और पक्षपातपूर्ण नीतियों का मुंह बोलता सबूत है। (AK)
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