ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति से क्यों निराश हुआ इस्राईल?
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ईरानी राष्ट्रपति चुनाव और प्रतिरोध के लिए श्री पिज़िश्कियान के मजबूत समर्थन से निराश हो गया है इस्राईल
पार्सटुडे- इस्लामी गणतंत्र ईरान के 14वें राष्ट्रपति चुनाव के सफल आयोजन की वजह से पिछले चुनावों की तरह इस बार भी, ज़ायोनी हलकों और उनसे संबद्ध मीडिया में निराशा की लहर दौड़ पड़ी है।
ईरान के 14वें राष्ट्रपति चुनावों में मसऊद पिज़िश्कियान की जीत के बाद, कई ज़ायोनी मीडिया ने इस बात पर और सामान्य तौर पर पश्चिमी जगत के साथ ईरान के संबंधों में सुधार की संभावना, परमाणु समझौते के फिर से ज़िंदा होने और एक उदारवादी और रिफ़ार्मिस्ट धड़े के उम्मीदवार की जीत जैसी अवधारणाओं पर विचार करके इस पर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं।
मिसाल के तौर पर इस्राईली समाचार पत्र हारेत्ज़ ने इस बारे में लिखा, पिज़िश्कियान 2005 के बाद सत्ता में आने वाले पहले रिफ़ार्मिस्ट हैं और पिज़िश्कियान से उम्मीद की जाती है कि वे पश्चिम के प्रति एक व्यवहारिक विदेश नीति अपनाएंगे और परमाणु समझौते को बहाल करेंगे।
पार्सटुडे के अनुसार, यह स्पष्ट है कि ज़ायोनियों और उनके संबद्ध मीडिया को जिन्होंने हमेशा ईरान पर अधिकतम दबाव और इस देश को अलग थलग करने की नीति का पालन किया है, उम्मीद थी कि ईरान में कुछ आर्थिक समस्याओं के कारण लोग चुनावों का स्वागत नहीं करेंगे और इस प्रकार, दबाव बढ़ने, विदेशी संबंधों के नष्ट होने और ईरानी सरकार को क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को बदलने पर मजबूर करने के हालात पैदा हो जाएंगे।
इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, ज़ायोनियों और उनके संबद्ध तत्वों ने एक उम्मीदवार के पक्ष में सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाकर अन्य उम्मीदवारों को जज़्बात को भड़काने की भी कोशिश की जबकि कुछ ने द्विध्रुवीकरण, विभाजन, मतभेद पैदा करने, उम्मीदवारों के समर्थकों को सड़कों पर लाने और संघर्ष पैदा करने के प्रयास किए जो ईरान के दुश्मनों की साज़िशों का हिस्सा थे।
यह चुनाव के बहिष्कार की ईरान विरोधियों की कोशिशों की नाकामी के बावजूद हुआ है और ईरान के नव निर्वाचित राष्ट्रपति के बयान से पता चलता है कि ईरान की अहम और रणनीतिक नीतियां न केवल नहीं बदलेंगी बल्कि और अधिक ताकत के साथ जारी रहेंगी।
इस संबंध में, मसऊद पिज़िश्कियान ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह के महासचिव को संबोधित एक संदेश में लिखा: इस्लामी गणतंत्र ईरान अवैध ज़ायोनी सरकार के मुक़ाबले में सदैव क्षेत्र के लोगों के प्रतिरोध का समर्थन करेगा। प्रतिरोध के समर्थन का आधार ईरान की इस्लामी व्यवस्था की सैद्धांतिक नीति, स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी रह. की आकांक्षा और ईरान की इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता का मार्गदर्शन रहा है और यह समर्थन पूरी शक्ति व ताक़त के साथ जारी रहेगा और मुझे पूरी उम्मीद है कि क्षेत्रीय प्रतिरोध व आंदोलन ग़ैर क़ानूनी व अवैध सरकार को इस बात की अनुमति नहीं देंगे कि वह फ़िलिस्तीन के मज़लूम लोगों और क्षेत्र के दूसरे राष्ट्रों के ख़िलाफ़ अपने अपराधों और युद्धोन्मादी कार्यों को जारी रख सके।
यह स्पष्ट है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान की विदेश नीति किसी भी प्रकार के वर्चस्व को अस्वीकार करने और वर्चस्व को स्वीकार करने को नकारने है, देश की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने और सभी मुस्लिमों और ग़ैर-मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा पर आधारित है।
इस संबंध में, इस्लामी गणतंत्र ईरान पड़ोसियों के साथ अच्छे और मित्रता पूर्ण संबंधों की नीति अपनाकर, प्रतिरोध के मोर्चे का समर्थन करके, बहुपक्षीयवाद की हिमायत करके, ब्रिक्स और शंघाई जैसे अंतरराष्ट्रीय तंत्रों में शामिल होकर, विदेश नीति के क्षेत्र में एक उपयुक्त और प्रभावी पोज़ीशन हासिल करने का प्रयास कर रहा है और अपेक्षा इस बात है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान के नौवें राष्ट्रपति कार्यकाल में भी इन सब चीज़ों का गंभीरता से पालन किया जाएगा।
यही कारण है कि ज़ायोनियों और उनके पश्चिमी समर्थक, विशेष रूप से अमेरिकी सरकार, हाल के ईरानी चुनावों के परिणामों और व्यक्तिगत रूप से डॉक्टर मसऊद पिज़िश्कियान से निराश हो गयीं हैं क्योंकि इन चुनावों के परिणाम उनके लिए एक और नाकामी हैं। यही वजह है कि ईरान की नीतियों को बदलना विशेषकर प्रतिरोध के समर्थन के बारे में उसकी नीतियोंक को तब्दील करने की नीति उनके लिए बहुत बड़ी नाकामी है।
कीवर्ड्ज़: मसऊद पिज़िश्कियान कौन है?, ईरान और इस्राईल, राष्ट्रपति चुनाव, सैयद हसन नसरुल्लाह, प्रतिरोध का मोर्चा
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