पश्चिमी मीडिया द्वारा ईरान के बारे में झूठी मौतों का निर्माण
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ईरानी विरोध प्रदर्शनों से मौतों का निर्माण, पश्चिमी मीडिया का एजेंडा
पार्स टुडे: पश्चिम और इस्राइल से जुड़े मीडिया ने ईरान की छवि को दूषित करने के लिए हाल की अशांति में मौतों के निर्माण का प्रोजेक्ट शुरू किया है और लगातार बढ़ती हुई मृत्यु संख्या के आंकड़े पेश कर रहे हैं। इनमें से कई व्यक्ति जिनके नाम "मारे गए" लोगों की सूची में डाले गए हैं, पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहे हैं और ऐसी कहानियों के प्रकाशन पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में ईरान में हाल की अशांति, अरब और जायोनीस्ट मीडिया तथा राजनीतिक धाराओं द्वारा झूठी कहानियों को फैलाने के लिए एक वैचारिक मैदान और मंच बन गई है, ये विरोध प्रदर्शन शुरू में पूरी तरह से शांतिपूर्ण और नागरिक थे और पुलिस एवं सुरक्षा बलों ने भी प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा के लिए पूरी कोशिश की। लेकिन सशस्त्र आतंकवादी तत्वों के घुसपैठ करने के बाद, विरोध प्रदर्शनों का रुख उपद्रव और अराजकता की ओर मुड़ गया।
पार्स टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादियों ने, जिन्हें पश्चिमी और जायोनीस्ट सुरक्षा एवं खुफिया अधिकारियों के अनुसार शत्रुतापूर्ण शासनों द्वारा सशस्त्र किया गया था, "ईरान इस्लामिक गणराज्य द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एक व्यापक व्यवस्थित हिंसा" की कहानी गढ़ने के उद्देश्य से "मौतों का निर्माण" शुरू किया, ताकि दंगाइयों से जुड़े मीडिया के लिए प्रचार सामग्री तैयार की जा सके। मौजूदा दस्तावेजों और गवाहों तथा सुरक्षा विशेषज्ञों के बयानों के आधार पर, यह मौतों का निर्माण दो स्तरों पर हुआ है, पहला, सड़कों पर आतंकवादियों द्वारा लोगों की हत्या के माध्यम से और दूसरा, झूठी कहानियाँ गढ़ने और मारे गए लोगों के झूठे आंकड़े व नाम पेश करने के माध्यम से। इस रिपोर्ट में इस मामले के विवरण की जांच की गई है।
अरे... मैं अभी ज़िंदा हूँ!
कुछ मीडिया ने ईरानी विरोध प्रदर्शनों में मारे गए लोगों के बारे में अवास्तविक खबरें प्रकाशित की हैं। इनमें से कुछ व्यक्ति जिन्हें मारे गए बताया गया है, वे जीवित हैं और उनकी हत्या तो दूर की बात है, ईरानी सरकार की सुरक्षा बलों द्वारा मारे जाने का तो सवाल ही नहीं उठता! यहाँ ऐसे कुछ मामले दिए गए हैं।
आतंकवादी समूह मुजाहिदीन-ए-खल्क (एमकेओ) से जुड़े मीडिया, जिन्हें ईरान में मुनाफिकीन (दगाबाज) के नाम से जाना जाता है, ने 'कुरोश शीरीनी' नाम के एक किशोर लड़के की तस्वीर प्रकाशित कर दावा किया कि तेहरान की पिरोजी सड़क पर ईरानी सुरक्षा बलों की गोली लगने से हाल की अशांति में उसकी मौत हो गई। लेकिन सोशल मीडिया पर खोज करने पर पता चला कि इन मीडिया द्वारा प्रकाशित की गई तस्वीर जायोनी शासन के पूर्व प्रधानमंत्री 'नफताली बेनेट' के बेटे 'डेविड बेनेट' की है।
कुछ पश्चिमी मीडिया ने दावा किया कि 'शहरज़ाद मखमी' नाम की 19 वर्षीय लड़की, जो ब्लॉगर नाम 'डायना बहादुर' या 'बेबी राइडर' से मशहूर है और गोलेस्तान प्रांत (उत्तरी ईरान) की रहने वाली है, 9 जनवरी की उपद्रव की घटना में मारी गई, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार उसकी मौत एक सड़क दुर्घटना में हुई है। यह युवती 23 जनवरी की रात 10:30 बजे (उपद्रव के लगभग दो सप्ताह बाद) जंगल-ए-गोलेस्तान से गालीकश शहर के रास्ते में पासंग गाँव के पास, गार्ड रेल से टकराकर मारी गई। गोलेस्तान ट्रैफिक पुलिस ने इस दुर्घटना का कारण ड्राइवर की लापरवाही और अधिक गति के कारण वाहन पर नियंत्रण न रख पाना बताया। शहरज़ाद के पिता 'करीम मखमी' ने पत्रकारों से बातचीत में अपनी बेटी की सड़क दुर्घटना में मौत की पुष्टि करते हुए जोर देकर कहा कि उसकी मौत का उपद्रव से कोई लेना-देना नहीं है।
'मुबीना बहिश्ती', 21 वर्षीय गोरगान (गुरगान) निवासी लड़की, ईरान के विरोधी मीडिया के मौत-निर्माण प्रोजेक्ट की एक अन्य पीड़ित है। कुछ दिनों बाद जब वह सोशल मीडिया पर गई, तो उसे आभास हुआ कि साइबर स्पेस में उसकी मौत की अफवाह फैल रही है। इसलिए मजबूरी में उसने 28 जनवरी को अपनी एक वीडियो जारी कर अपने जीवित होने की घोषणा की। मुबीना ने कहा: "मैं वास्तव में हैरान हूँ कि यह काम किसने किया? मैं पूरी तरह स्वस्थ और सकुशल हूँ, मेरी मौत की तस्वीरें और वीडियो क्यों प्रसारित किए जा रहे हैं? कृपया विदेशी मीडिया की बातों पर विश्वास न करें, उनके पास हमें झूठ बोलने के अलावा कहने के लिए कुछ नहीं है!"
एक अन्य मामले में, इस्राइल के चैनल 12 टीवी ने एक जायोनी लड़की 'नोया ज़ायोन' जो कब्जे वाले इलाकों की निवासी है, को ईरानी विरोध प्रदर्शनों में मारी गई यहूदी नागरिक के रूप में पेश किया। इस युवती ने भी सोशल मीडिया 'टिकटॉक' पर एक वीडियो जारी कर अपने जीवित होने की घोषणा की। ज़ायोन ने कहा: "मेरा दिल काँप रहा है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन में ऐसा होगा। मैं अपने घर पर हूँ और मुझे व्यायाम के लिए बाहर जाना है"। उसने यह भी जोर देकर कहा कि उसका ईरान में कोई रिश्तेदार या परिचित नहीं है। कुछ मीडिया ने इस इस्राइली लड़की को 'सनाज जवाहेरियान' के नाम से याद किया और दावा किया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तारी के बाद उसे मौत के कगार तक पिटाई की गई और 13 दिन बाद उसकी लाश वापस की गई। इस मामले ने कई साइबर एक्टिविस्टों को व्यंग्य और मजाक बनाने का मौका दिया। कुछ लोगों ने व्यंग्यपूर्वक ज़ायोन से कहा: "शायद तुम ईरान में मर गई हो, लेकिन तुम्हारा शरीर अभी गर्म है और तुम्हें अभी पता नहीं चला।"
मौत-निर्माण प्रोजेक्ट के तहत एक अन्य खबर में घोषणा की गई कि ईरान के लुरेस्तान प्रांत के पोल-ए-दोख्तर जिले के बॉक्सिंग एसोसिएशन के प्रमुख 'अली आलीपुर' को 9 जनवरी को विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किया गया और उन्हें यातना देकर मार दिया गया। जबकि वास्तव में वह 22 जनवरी को हृदय की बीमारी के कारण चल बसे और अगले दिन प्रांतीय खेल अधिकारियों की उपस्थिति में एक समारोह में दफनाए गए।
जायोनी नेटवर्क 'ईरान इंटरनेशनल' ने एक अन्य खबर में, बॉडीबिल्डिंग खिलाड़ी 'मोहम्मद रसूल बयाती' को ईरान में हाल की अशांति के एक अन्य शिकार के रूप में नामित किया। जवाब में, ईरानी रेडियो और टीवी के एक रिपोर्टर ने इस खिलाड़ी के जिम जाकर उनसे बातचीत की। बयाती ने ऐसी झूठी खबरों के प्रकाशन पर आश्चर्य और अफसोस जताते हुए घोषणा की कि वह पूरी तरह स्वस्थ हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें सोमवार से परिवार और रिश्तेदारों की तरफ से अनगिनत फोन आए हैं जो झूठी खबरों से प्रभावित होकर चिंता और बेचैनी में थे।
फ़ार्स प्रांत के कुवार शहर के ईरानी नागरिक 'रेज़ा नेकनाम' भी मीडिया के मौत-निर्माण प्रोजेक्ट के शिकार थे, उन्होंने एक वीडियो जारी कर अफवाहों को खारिज किया और गोली लगने की खबर का खंडन करते हुए अपने पूर्ण स्वास्थ्य की सूचना दी।
एक पुराने सिनेरियो की पुनरावृत्ति
इंटरनेट पर इस तरह के मामले बहुतायत में हैं और आम उपयोगकर्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध हैं। धीरे-धीरे तनाव कम होने और आतंकवाद को समर्थन देने वाले मीडिया द्वारा उठाए गए धूल के बैठ जाने के साथ, और अधिक सच्चाई और दस्तावेज सामने आएंगे। इन मीडिया और उनके समर्थक व्यक्तियों एवं धाराओं के इतिहास को देखने से पता चलता है कि उनके रिकॉर्ड में इसी तरह के मामले बहुतायत में मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, जुलाई 1999 में जब कुछ छात्रों के सीमित विरोध प्रदर्शन के दौरान 'अहमद बातेबी' ने एक खून से सनी शर्ट अपने सिर पर उठाई और दावा किया कि यह एक विरोध कर रहे छात्र की है, तो अमेरिकी पत्रिका 'द इकोनॉमिस्ट' ने बातेबी की तस्वीर अपने मुख्य पन्ने पर प्रकाशित की। जबकि सालों बाद पता चला कि वह शर्ट 'बकरी के खून' से सनी हुई थी!
ईरानी लोगों और सरकार के खिलाफ झूठ फैलाने के इस कांड और इतिहास के बावजूद, अहमद बातेबी को 'मसीह अलीनेजाद' (अमेरिकी विदेश मंत्रालय की कर्मचारी) के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 15 जनवरी की बैठक में ईरान में हो रही घटनाओं पर बोलने के लिए पश्चिमी अधिकारियों द्वारा आमंत्रित किया गया था। शायद ऐसे आमंत्रण का उद्देश्य, जरूरी नहीं कि सच्चाई बयान करना हो, बल्कि पहले से लिखे गए सिनेरियो की पुनरावृत्ति और पुष्टि करना है। ईरान की घटनाओं के बारे में इन दोनों की कहानी इतनी पक्षपातपूर्ण और अवास्तविक थी कि संयुक्त राष्ट्र में रूस के स्थायी प्रतिनिधि 'वसिली नेबेंज़िया' ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा: "ये व्यक्ति जो 20 से अधिक वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं और वहीं अपने ईरान-विरोधी कार्यक्रम चला रहे हैं, ईरान के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते।"
मौतों का निर्माण क्यों?
अमेरिका और जायोनी शासन मौत-निर्माण प्रोजेक्ट के माध्यम से दो लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं। पहला है, समानांतर संकट पैदा करने और गज़ा में शासन द्वारा लोगों के खिलाफ किए गए भयावह अत्याचार से जनता का ध्यान हटाने के लिए रिवर्स इंजीनियरिंग की रणनीति, जहाँ 7 अक्टूबर 2023 से अब तक शहीदों की संख्या 71,662 और घायलों की संख्या 171,428 तक पहुँच गई है। इसलिए ईरान में भी ऐसे ही या उसके करीब के आंकड़े 'गढ़े जाने' हैं ताकि उस अत्याचार की गंभीरता कम हो सके। इस विवरण के साथ, पश्चिमी और जायोनी मीडिया द्वारा ईरानी विरोध प्रदर्शनों में 71,662 झूठी मौतों के आंकड़े (गज़ा के शहीदों के बराबर) पेश करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
दूसरा, अमेरिका का रिकॉर्ड (विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन) दर्शाता है कि वह आमतौर पर अपने औपनिवेशिक लक्ष्यों को सतही तौर पर उचित लगने वाले नारों के पीछे छुपाता है ताकि अपने हितों की पूर्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहमति प्राप्त कर सके। कुछ समय पहले अमेरिकी नेताओं ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति 'निकोलस मादुरो' के खिलाफ व्यापक प्रचार कर उन पर मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप लगाए और फिर सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानदंडों के विपरीत, उन्हें रातोंरात अपहरण कर अमेरिका ले आए। जबकि कई अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों ने वाशिंगटन के इस कदम का उद्देश्य वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर वर्चस्व स्थापित करना बताया। इराक और अफ़ग़ानिस्तान पर हमले में अमेरिका का रिकॉर्ड भी ऐसा ही है। ईरान के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि ईरान के खिलाफ 12-दिवसीय लगाए गए युद्ध में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में पश्चिमी पक्षों की विफलता के बाद, संभवतः वाशिंगटन एक नए बहाने की तलाश में है ताकि अपने हस्तक्षेप और आक्रामक कार्यों को सही ठहरा सके। (AK)
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