आतंकवाद का विस्तार अमरीकी नीतियों का परिणाम
संयुक्त राष्ट्र संघ में ईरान के प्रतिनिधि ग़ुलाम अली ख़ुशरू ने पश्चिमी एशिया क्षेत्र में आतंकवाद और चरमपंथ के विस्तार का मुख्य कारण सैन्य हस्तक्षेप बताया है।
उन्होंने प्रेस टीवी से बात करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान क्षेत्र में कई सैन्य हस्तक्षेप हुए और उसके परिणाम में चरमपंथ और कट्टरपंथ ने सिर उठाया है। पश्चिमी एशिया का क्षेत्र, दुनिया के सबसे संकटमयी क्षेत्रों में से एक है। विदेशी हस्तक्षेप के कारण जहां एक ओर क्षेत्र की स्थिति कई गुना संकटमयी हो गयी है वहीं क्षेत्र की तानाशाही सरकारें भी मज़बूत हुई हैं। विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के कारण आतंकवाद और हिंसा की परिभाषाएं अपना मुख्य अर्थ खो चुकी हैं और दुनिया में विभिन्न गुटों के रूप में आतंकवाद मुंह बाए खड़ा हुआ है।
11 सितंबर की घटना ने आतंकवाद के संघर्ष को अमरीकी सरकार के लिए प्राथमिक मुद्दा बना दिया था किन्तु आज अफ़ग़ानिस्तान और उसके बाद इराक़ में इस देश की सैन्य उपस्थिति के बावजूद न तो अशांति में कमी हुई और न आतंकवाद का सफ़ाया हुआ बल्कि इसके विपरीत हिंसा और चरमपंथ का विस्तार हो गया।
अमरीका ने 2001 में 11 सितंबर की घटना के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर सैन्य चढ़ाई कर दी ताकि तालेबान और अलक़ायदा को पराजित कर सके किन्तु इसका परिणाम ज़्यादा अच्छा नहीं था। आज न तालेबान पराजित हुआ और न ही अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति 16 वर्ष पहले की स्थिति से बेहतर हुई। अमरीकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में यथावत मौजूद हैं और इसी सैन्य उपस्थिति के साए में दाइश ने भी अपनी उपस्थिति की घोषणा कर दी है।
अफ़़गानिस्तान के मामलों के टीकाकार वहीद मुजदा ने रेडियो तेहरान की पश्तु सेवा से बात करते हुए कहा कि अमरीका पिछले 16 वर्ष से अफ़ग़ान समस्या का समाधान युद्ध के ज़रिए न कर सका और न ही तालेबान का सफ़ाया कर सका, या शायद उसका इरादा ही न हो इस काम का, अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध एक प्रकार से बंद गली में पहुंच गया है। (AK)