ईरान से क्यों घबरा रहा है अमरीका?!
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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने अपने हालिया भाषण में ईरान के ख़िलाफ़ नई रणनीति की घोषणा की। उन्होंने ईरान को मध्यपूर्व और दक्षिण पश्चिमी एशिया में कठिनाइयों की वजह ईरान है। ट्रम्प इतना तिलमिलाए हुए हैं कि उन्होंने ईरान पर तालेबान और अलक़ायदा का समर्थन करने का आरोप भी लगा दिया जो ईरान के कट्टर दुशमन समझे जाते हैं।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Oct १९, २०१७ १३:१७ Asia/Kolkata
  • ईरान से क्यों घबरा रहा है अमरीका?!

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने अपने हालिया भाषण में ईरान के ख़िलाफ़ नई रणनीति की घोषणा की। उन्होंने ईरान को मध्यपूर्व और दक्षिण पश्चिमी एशिया में कठिनाइयों की वजह ईरान है। ट्रम्प इतना तिलमिलाए हुए हैं कि उन्होंने ईरान पर तालेबान और अलक़ायदा का समर्थन करने का आरोप भी लगा दिया जो ईरान के कट्टर दुशमन समझे जाते हैं।

जार्ज टाउन विश्व विद्यालय की शोधकर्ता शीरीन हंतर ने ईरान से अमरीका की बढ़ती दुशमनी के कारणों की समीक्षा करते हुए लिखा है कि अमरीका को यह बर्दाश्त नहीं है कि ईरान दुनिया की मध्यम स्तर की ताक़त बन जाए।  घोषणा की। उन्होंने ईरान को मध्यपूर्व और दक्

सुश्री शीरीन ने आगे लिखा कि ईरान के बारे में ट्रम्प के भाषण का सबसे ख़तरनाक भाग उनकी खोखली धमकी है। ईरान अमरीका संबंधों से जुड़े परिवर्तनों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों की सबसे बड़ी समस्या राजनैतिक व वैचारिक बुनियादें हैं। जब तक ईरान में क्रान्ति नहीं आई थी दोनों देशों के संबंध अच्छे और यदि ईरान में वर्तमान इस्लामी शासन बदल जाए तो फिर ईरान और अमरीका के बीच कोई मुशकिल नहीं रह जाएगी।

यहां यह सवाल पैदा होता है कि अमरीका को यह क्यों बर्दाश्त नहीं है कि ईरान शांति के साथ अपने मामलों का संचालन करता रहे?

अमरीका ने वर्ष 2003 से ईरान के संबंध में नई कार्यशैली अपनाई जिसका उद्देश्य यह था कि ईरान को भीतर से ध्वस्त कर दिया जाए। इसके आर्थिक प्रतिबंधों का सहारा लिया गया। यह कोशिश की जा रही है कि ईरान अपनी अर्थ व्यवस्था को मज़बूत न कर पाए।

अमरीका कदापि नहीं चाहता कि ईरान मध्य स्तर की वैश्विक ताक़त बने क्योंकि मध्य स्तर की वैश्विक ताक़तों का यह तरीक़ा होता है कि वह सहयोग के लिए तो तैयार होती हैं लेकिन बड़ी ताक़त की पिछलग्गू बनना पसंद नहीं करतीं।

अमरीका की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह ईरान की हक़ीक़त को समझ नहीं पा रहा है, यह ग़लती ब्रिटेन ने भी की है। इस बिंदु का उल्लेख 1960 के दशक में ईरान में ब्रिटेन के राजदूत रह चुके डेनिस राइट ने किया और कहा कि अमरीका ने कभी भी ईरान को अपना उपनिवेश बनाने की ज़रूरत नहीं समझी जबकि ब्रिटिश अधिकारियों ने इस सच्चाई को समझ लिया था कि ईरान भी रूस की तरह एसी ताक़त बनने के रास्ते पर निकल पड़ा है कि वह बड़ी ताक़तों को चुनौती दे सकता है।

यही स्थिति ईरान के क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की है। यह देश चाहते हैं कि ईरान पर हमला हो जाए और उसे दंडित किया जाए इसलिए नहीं कि वह वास्तव में कोई ख़तरा बन गया है बल्कि इस लिए कि वह ईरान को ताक़तवर बनता नहीं देख पा रहे हैं। यही वजह है कि जब ईरान के अभिनेता शहाब हुसैनी को वर्ष 2016 में फ़िल्म फ़ेयर एवार्ड मिला तो सोशल मीडिया पर सऊदी टीकाकारों ने लिखा कि शहाब हुसैनी तो जनरल क़ासिम सुलैमानी से भी ज़्यादा ख़तरनाक है।