जॅान बोल्टन का हंगामा, मगर ईरान अपने रुख पर डटा है
अमरीकी राष्ट्रपति के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॅान बोल्टन ने अपनी तीन दिवसीय इस्राईल यात्रा के बाद कहा है कि ईरान के खिलाफ दबाव और प्रतिबंध बढ़ाए जाएंगे ताकि तेहरान का व्यवहार बदल जाए।
ईरान से बोल्टन की शत्रुता किसी से ढकी नहीं है और उन्होंने हमेशा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल उद्योग और क्षेत्र में उसकी प्रभावशाली भूमिका का विरोध किया है और इसी लिए उन्हें डोनाल्ड ट्रम्प की टीम में जगह भी मिली है। ट्रम्प की मंडली पर यदि नज़र डाली जाए तो उसमें ईरान के विरोधियों की भरमार नज़र आएगी। अस्ल में ट्रम्प की सरकार, ईरान पर दबाव डाल कर उसे वार्ता के लिए तैयार करना चाहती है लेकिन इस प्रकार की नीति , पिछले चालीस वर्षों से सफल नहीं हो पायी है।
अमरीका में आने जाने वाली विभिन्न सरकारों ने गत चालीस वर्षों के दौरान आर्थिक प्रतिबंधों से लेकर युद्ध व साज़िश जैसे विभिन्न हथकंडे इस्तेमाल करके ईरान को अमरीका पर निर्भरता स्वीकार करने वाला देश बनाने की अथक कोशिश की लेकिन हर बार ईरानी जनता की एकता और अधिकारियों की सूझ बूझ ने उसकी साज़िशों को नाकाम बना दिया। आज ट्रम्प की सरकार भी उसी राह पर चल रही है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने इस संदर्भ में अपने हालिया बयान में कहा है कि अमरीकी पहले भी अपने बयानों में राजनीतिक शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखते थे लेकिन अमरीका के वर्तमान अधिकारी कुछ इस प्रकार की बेशर्मी और घिनौने रूप से विश्व वासियों से बात करते हैं मानो शर्म व लज़्जा नाम की चीज़ पूरी तरह से उनसे छिन गयी है। ईरान पर अमरीकी सरकार क्षेत्र में हस्तक्षेप का आरोप एेसी दशा में लगा रही है कि दुनिया का कोई इलाक़ा, अमरीका के हस्तक्षेप से बचा नहीं है और यमन में महिलाएं और बच्चे अमरीका की ओर से हरी झंडी और अमरीकी बमों से मारे जा रहे हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीफन वाॅल्ट का कहना है कि इलाक़े में अमरीका की घुसपैठ का लगभग पूरी तरह से नकारात्मक प्रभाव ही रहा है और इराक़ में सन 2003 में अमरीका का परिणाम, दाइश और हज़ारों की मौत के रूप में सामने आया है। (Q.A.)