ईरान की ओर से वार्ता के संबंध में पोम्पियो की खोखली आशा
पांच नवम्बर से ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका के दूसरे चरण के प्रतिबंधों के लागू होने के बाद, ईरान पर दबाव डालने के लिए वाॅशिंग्टन की नई लड़ाई शुरू हो गई हैै। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने कई बार दावा किया है कि वे प्रतिबंध लगा कर ईरान को वाॅशिंग्टन की मांगें मानने पर विवश कर देंगे।
ट्रम्प ने इसी तरह कई बार दावा किया है कि वे ईरान के साथ वार्ता के लिए तैयार हैं। कुछ अन्य अमरीकी अधिकारी भी इसी तरह के दावे कर चुके हैं। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक इंटरव्यू के दौरान इस सवाल के जवाब में कि क्या उन्हें इस बात के चिन्ह दिखाई दिए हैं कि ईरान वार्ता की मेज़ पर आने के लिए तैयार है? कहा कि नहीं, अभी हमें इस तरह का कोई चिन्ह दिखाई नहीं दिया है लेकिन हमें पूरी आशा है कि ईरान एेसा करेगा। उन्होंने इसी के साथ यह आशा भी जताई कि अगर ईरान वार्ता के लिए तैयार नहीं होता है तो कम से कम उसका व्यवहार बदल जाएगा।
एेसा प्रतीत होता है कि पोम्पियो और अन्य अमरीकी उच्चाधिकारियों की नज़र में ईरान व अमरीका के बीच वार्ता का अर्थ, तेहरान की ओर से वाॅशिंग्टन की सभी अवैध और ग़ैर क़ानूनी मांगों को बिना शर्त आंख बंद करके स्वीकार कर लेना है। पोम्पियो ने अमरीका का विदेश मंत्री बनते ही ये मांगें बारह शर्तों के रूप में पेश की थीं जिनमें ईरान के परमाणु व मीज़ाइल कार्यक्रम को पूरी तरह से बंद करना और तेहरान की क्षेत्रीय नीतियों में बदलाव जैसी बातें शामिल थीं। वास्तव में अमरीका चाहता है कि ईरान, उसके सामने पूरी तरह से झुक जाए जिससे न केवल ईरान की स्वाधीनता बल्कि उसकी पहचान पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाएगा।
तथ्य यह है कि अमरीका की ओर से ईरान पर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं वे इस देश में ग़रीबी और अशांति पैदा करने के उद्देश्य से हैं। ट्रम्प की सोच यह है कि ईरान के ख़िलाफ़ आर्थिक दबाव बढ़ाने से इस देश में आंतरिक स्तर पर अशांति बढ़ जाएगी और अंततः उसका परिणाम इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की समाप्ति पर होगा जबकि अगर ईरान की स्थिति पर एक उचटती हुई नज़र भी डाली जाए तो ट्रम्प का यह दावा पूरी तरह से खोखला नज़र आएगा। अमरीका यह दावा भी कर रहा है कि प्रतिबंधों का लक्ष्य ईरान की जनता नहीं बल्कि सरकार है और इसका उद्देश्य ईरान की सरकार का व्यवहार बदलना है जबकि अगर प्रतिबंधों के प्रभाव को देखा जाए तो स्पष्ट रूप से यही दिखाई देगा कि इनके माध्यम से आम जनता को निशाना बनाया गया है जो पूरी तरह से अमानवीय और मानवाधिकार विरोधी क़दम है। (HN)