आईआरजीसी पर अमरीकी फैसले से क्या ईरान अमरीका युद्ध हो जाएगा?
ईरान के क्रांति संरक्षक बल आईआरजीसी को अमरीका ने जब से आतंकवादी संगठनों की सूचि में शामिल किया है तब से ईरान और अमरीका के मध्य युद्ध की बात हो रही है और लोग कह रहे हैं कि जल्द ही क्षेत्र में एक नये युद्ध का खतरा बढ़ रहा है तो क्या सच में एसा हो सकता है?
किसी भी युद्ध के लिए कुछ कारक और कुछ हालात होते हैं और जब तक वह लक्षण, कारक और हालात न हों दो देशों में युद्ध की संभावना नहीं रहती है। दो देश अगर सैनिक शक्ति रखते हैं तो भले ही उनमें से कोई दूसरे से अधिक ताक़तवर हो, लेकिन वह एक दूसरे से युद्ध से बचते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि दोनों में एक दूसरे को नुक़सान पहुचांते की क्षमता है और दोनों को पता होता है कि अगर हारे भी न तो जीत भी आसान नहीं होगी। अगर दो देशों में अत्याधिक राजनीतिक मतभेद होते हैं तो प्रायः दोनों के बीच, शीत युद्ध जारी रहता है।
अमरीकी सरकार, 40 वर्षों से ईरान को धमकी दे रही है, बल्कि ईरान के तबस नामक मरुस्थल में तो उसने सैनिक भी उतार दिये थे लेकिन उसमें भी उसे अत्याधिक शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था इस लिए अमरीका, ईरान के खिलाफ प्राक्सी वार को सब से अच्छा विकल्प समझता है लेकिन इराक़ में सद्दाम सरकार के बाद, अमरीका किसी एसी सरकार की खोज नहीं कर पाया जो ईरान के खिलाफ प्राक्सी वार में उसका साथ दे। इस लिए आईआरजीसी के खिलाफ अमरीकी क़दम के बाद जो लोग युद्ध की बात कर रहे हैं उन्हें अमरीकी अधिकारियों के बयानों पर ध्यान देना चाहिए। अमरीकी विदेशमंत्री पोम्मियो ने , आईआरजीसी के खिलाफ अमरीकी क़दम के एलान के बाद कहा है कि अगर ईरान क्षेत्र में अमरीकी सैनिकों पर हमला करने की सोच रहा है तो मैं ईरानी नेताओं से कहना चाहता हूं कि वह अपने इस तरह से बयानों पर फिर से विचार कर लें। पोम्मियो के बयान से यह समझा जा सकता है कि अमरीका को अपने इस एलान के बाद, ईरान की ओर से कार्यवाही की चिंता है न कि वह स्वंय कुछ करना की सोच रहा है हालांकि इस्लामी गणतंत्र ईरान का रिकार्ड रहा है कि उसने कभी किसी पर आक्रमण का आरंभ नहीं किया।
अमरीकी विदेशमंत्रालय में ईरान एक्शन ग्रुप के प्रमुख ब्रायन हुक ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अमरीका की नीति, ईरान के साथ युद्ध से बचने पर आधारित है। उन्होंने एक फार्सी भाषा के टीवी चैनल से बात चीत में कहा है कि अमरीका, ईरान के खिलाफ युद्ध नहीं चाहता। ब्रायन हुक ने अपने एक आलोख में भी कहा है कि आईआरजीसी को आतंकवादी घोषित करने का उद्देश्य, ईरान को अपना व्यवहार बदलने पर मजबूर करना है। वास्तव में अमरीका के इस क़दम का मक़सद ईरान को अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर करना है किंतु उसकी नीति में युद्ध का कहीं निशान नहीं मिलता। अमरीकी सेना, स्वंय आतंकवादी और आतंकवादियों को प्रशिक्षण देती रही है और उसे ईरानी सेना की क्षमताओं और शक्ति के बारे में भली भांति पता है। अमरीका को बहुत अच्छी तरह से मालूम है कि ईरान, लीबिया , इराक़ और अफगानिस्तान से बहुत अलग है। लीबिया और इराक़ ने , सद्दाम और गद्दाफी के सत्ताकाल में अपना सब कुछ लुटा दिया और एक एक करके अपने सारे हथियार रख दिये ताकि शायद इस तरह से अमरीका उनका पीछा छोड़ दे और जब वह खाली हाथ हो गये तब अमरीका ने उन पर हमला कर दिया।
इसके साथ यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सद्दाम और गद्दाफी, तानाशाह थे और उनकी सत्ता को जन समर्थन प्राप्त नहीं था और उनकी पराजय में इस हक़ीक़त ने निर्णायक भूमिका निभाई है और अमरीका के आगे उनके झुकने की मुख्य वजह भी यही थी। ईरान में सरकार और व्यवस्था को भरपूर जन समर्थन प्राप्त है और ईरान ने अमरीका को, मनाने के लिए एक क़दम भी पीछे हटना स्वीकार नहीं किया है जैसा कि सद्दाम और गद्दाफी ने किया था, इस लिए अमरीका के लिए ईरान के साथ युद्ध करना सरल नहीं होगा और यह बात अमरीका को भली भांति पता है अन्यथा जिस तरह से ईरान, मध्य पूर्व में एक के बाद एक अमरीकी योजनाओं पर पानी फेर रहा है , अमरीका अफगानिस्तान व इराक़ व लीबिया से बहुत पहले ईरान के खिलाफ कार्यवाही की कोशिश कर चुका है, अमरीका, ईरान को कमज़ोर करके उसके खिलाफ कार्यवाही करना चाहता है लेकिन ईरान है कि दिन प्रतिदिन मज़बूत होता जा रहा है, अमरीका के लिए मुख्य समस्या यह है। इस लिए फिलहाल युद्ध का कोई खतरा नहीं है और इस प्रकार की जो बातें हो रही है वह वास्तव में मनोवैज्ञानिक युद्ध का भाग है (Q.A.)