परमाणु समझौते से निकलकर अमरीका विश्व में अलग थलग पड़ गया है
परमाणु समझौता विश्व स्तर पर शांति व्यवस्था को मज़बूत बनाने के मार्ग में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता समझा जाता है, लेकिन अमरीका ने इस समझौते को ख़त्म करने क उद्देश्य से 8 मई 2018 को इससे बाहर निकलने का एलान कर दिया।
इस समझौते के अन्य पक्षों ने जिनमें रूस, चीन, फ़्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और ईरान शामिल हैं, अमरीकी दृष्टिकोण को स्वीकार करने से साफ़ इनकार कर दिया।
यूरोपीय संघ का मानना है कि अगर जेसीपीओए ख़त्म होता है तो इसके बहुत गंभीर परिणाम निकलेंगे और जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका की साख को बहुत नुक़सान हुआ है, उसी तरह यूरोप की विश्वनीयता पर भी सवाल खड़े होंगे। यूरोपीय संघ का कहना है कि यह समझौता कोई केवल दो देशों के बीच किया गया समझौता नहीं है, बल्कि यह एक बहु पक्षीय समझौता है और अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं एवं मतभेदों के समाधान के लिए एक आदर्श है।
चीन ने भी इस अंतरराष्ट्रीय समझौते का सम्मान किए जाने पर बल दिया है और यूरोपीय संघ की तरह ही वह भी दुनिया की एक बड़ी शक्ति के रूप में इस समझौते को सुरक्षित रखना चाहता है।
चीन और यूरोपीय संघ ने एक संयुक्त बैठक में घोषणा की है कि ईरान के साथ किया गया यह अंतरराष्ट्रीय समझौता, अमरीका की वादा ख़िलाफ़ी के बावजूद बाक़ी रहेगा और इसमें शामिल समस्त पक्ष इसमें किए गए वादों पर अमल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
रूस पहले से ही इस परमाणु समझौते के महत्व पर बल देता रहा है और उसने अमरीका के इससे निकलने का कड़ा विरोध किया था। इस प्रकार से विश्व समुदाय ने दर्शा दिया है कि वह अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की विदेश नीतियों से सहमत नहीं है और अमरीका के ग़ौर क़ानूनी फ़ैसलों के मुक़ाबले में वह ईरान के साथ खड़ा हुआ है।