ईरान और अमरीका की लड़ाई में कहां खड़ा है यूरोप?
फ़ार्स की खाड़ी में इस्लामी गणतंत्र ईरान और अमरीका के बीच तनाव बढ़ा और फिर इसमें कुछ कमी भी आई। इस लड़ाई में अमरीका की कोशिश यह रही कि वह यूरोप को अपने साथ रखे।
इसी लिए ब्रसेल्ज़ में यूरोपीय देशों की बैठक के अवसर पर अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने अपनी मास्को यात्रा को स्थगित किया और ब्रसेल्ज़ पहुंच गए। पोम्पेयो ने बाद में मास्को का दौरा किया।
इन यात्राओं में पोम्पेयो ने भरपूर कोशिश की कि वह ईरान के विरुद्ध अपने अभियान में यूरोप को अपने साथ लाएं लेकिन अमरीकी मैग्ज़ीन ब्लूमबर्ग ने अपने एक लेख में लिखा है कि पोम्पेयो का ब्रसेल्ज़ दौर भी नाकाम रहा और मास्को से भी उन्हें ख़ाली हाथ लौटना पड़ा।
पिछले हफ़्ते जब पोम्पेयो ब्रसेल्ज़ पहुंचे तो यूरोपीय देशों ने अमरीका का साथ देने का वादा करने के बजाए यह कहा कि वह उस परमाणु समझौते का पालन करेंगे जिससे अमरीका निकल गया है।
यूरोपीय देशों के साथ ही रूस का यह भी मानना है कि भले ही तनाव बढ़ गया हो लेकिन अमरीका ईरान से युद्ध करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए कि ईरान से युद्ध होता है तो कितना लंबा खिंचेगा इस बारे में कुछ ही नहीं कहा जा सकता। दूसरी बात यह कि युद्ध की स्थिति में दुनिया की तेल मंडियों की दुर्दश हो सकती है जिसका असर युद्ध करने वाले देशों ही नहीं सारी दुनिया की अर्थ व्यवस्थाओं पर पड़ना तय है।
रूस की रक्षा व विदश नीति परिषद के प्रमुख फ़्युडर कोकियानोफ़ का कहना है कि हमने ढाई साल में ट्रम्प की कार्यशैली और टैकटिक देखी है और इसी आधार पर हम कहते हैं कि वह युद्ध नहीं करना चाहते। वह केवल ताक़त दिखाते हैं और फिर आर्थिक हथकंडे प्रयोग करके अपने हित साधना चाहते हैं। ट्रम्प इस धारणा में हैं कि प्रतिबंधों से मजबूर होकर आख़िरकार ईरान अमरीका के साथ वार्ता की मेज़ पर बैठेगा।
इस्लामी गणतंत्र ईरान साफ़ साफ़ कह चुका है कि वर्तमान परस्थितियों में अमरीका के साथ कोई भी वार्ता नहीं हो सकती। अमरीका के साथ वार्ता ज़हर है और वर्तमान अमरीकी प्रशासन के साथ वार्ता तो इससे भी कई गुना ज़हरीली है।
यूरोपीय देशों को भी यही लगता है कि अमरीका ईरान से युद्ध के लिए तैयार नहीं है क्योंकि यदि अमरीका को सुपर पावर मान लिया जाए तब भी इस सच्चाई से तो कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि युद्ध की स्थिति में ईरान के पास मौजूद ताक़त प्रयोग हुई तो अमरीका को भी भारी नुक़सान उठाना पड़ सकता है और ट्रम्प प्रशासन वह नुक़सान उठाने के लिए हरगिज़ तैयार नहीं है।
जहां तक ईरान पर दबाव डालने और उसे वार्ता के लिए मजबूर करने की बात है तो यूरोपीय देशों को भी लगता है कि अमरीका इसमें सफल नहीं होगा।
फ़्रांस के एक अधिकारी ने तो अमरीकी मीडिया से कहा कि ट्रम्प और जान बोल्टन की यह ग़लतफ़हमी है कि वह दबाव डालकर ईरान को वार्ता की मेज़ पर बैठने पर मजबूर कर देंगे। फ़्रांसीसी अधिकारी ने कहा कि ट्रम्प और बोल्टन दोनों ही ग़लत सोच रहे हैं।
वैसे भी ईरान की इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने कहा कि दुशमन के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र का निश्चित विकल्प है प्रतिरोध, हैर मैदान में प्रतिरोध क्योंकि अमरीका से वार्ता एक ज़हर है। उन्होंने कहा कि कोई जंग नहीं होने वाली है यह इरादों की जंग है और ईरानी राष्ट्र की इच्छाशक्ति अमरीका से ज़्यादा है।
इस तनाव में यूरोप की स्थिति यह है कि वह न तो ईरान को छोड़ना चाहता है और न ही अमरीका का पूरी तरह विरोध मोल लेने के लिए तैयार है। यूरोप अपने लिए किसी उचित स्थिति की प्रतीक्षा में है लेकिन ख़ुद कोई एसी कोशिश नहीं कर रहा है कि यूरोप के लिए अनुकूल स्थिति पैदा हो जाए।