अमरीका, ज़रीफ़ पर प्रतिबंध लगाने से क्यों पीछे हट गया?
ईरान के विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ पर प्रतिबंध लगाने की अमरीका की घोषणा के 20 दिन बाद ही उन्होंने न्यूयाॅर्क की यात्रा की है जिससे पता चलता है कि वाइट हाउस के अधिकारी ज़रीफ़ पर प्रतिबंध को अपने एजेंडे से हटाने पर विवश हो गए हैं।
विदेश मंत्री ज़रीफ़ 13 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक-सामाजिक परिषद की वार्षिक बैठक में भाग लेने के लिए न्यूयाॅर्क रवाना हुए और इस प्रकार अमरीका की धौंस-धमकी और प्रतिबंध की एक और फ़ाइल बंद हो गई। ऐसा लगता है कि अपनी घोषणा के बीस दिन के अंदर ही ट्रम्प और उनकी टीम को अपनी ग़लती का आभास हो गया। रोएटर्ज़ ने अमरीकी सरकार के दो सूत्रों के हवाले से बताया है कि वाॅशिंग्टन ने ज़रीफ़ पर प्रतिबंध के मामले को फ़िलहाल अपने एजेंडे से निकाल दिया है। हालांकि अभी तक इस फ़ैसले का कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया है लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि यह काम अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की इच्छा पर किया गया है। इस प्रकार ट्रम्प सरकार में पाए जाने वाले मतभेद एक बार फिर उजागर हो गए हैं।
ज़रीफ़ पर प्रतिबंध क्यों?
अमरीका ने पिछले चार दशकों में अनेक ईरानी अधिकारियों को प्रतिबंधित किया है और ज़रीफ़ इस सूचि में सबसे ताज़ा व्यक्ति हैं। एक स्वाधीन और संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देश के विदेश मंत्री पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से ग़ैर क़ानूनी है। अब रहा यह सवाल कि अमरीका ने अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में क़ानून के पालन के दावे के बावजूद इस प्रकार के ग़ैर क़ानूनी काम का फ़ैसला क्यों किया तो इसके दो जवाब हो सकते हैं। पहला, वाइट हाउस के व्यवहार में पाया जाने वाला विरोधाभास है और दूसरा स्वयं ज़रीफ़ का व्यक्तित्व और उनका क्रियाकलाप है। ईरान के ये दक्ष कूटनयिक, किसी भी वार्ताकार से अधिक अपने सामने वाले पक्ष यानी अमरीका को पहचानते हैं। उन्होंने पिछले एक साल के दौरान "बी टीम" का परिचय कराके वाइट हाउस में पर्दे के पीछे लिए जाने वाले फ़ैसलों की पोल खोलने की कोशिश की है। ज़रीफ़ चालीस साल से अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं, छः साल से विदेश मंत्री हैं और उन्होंने परमाणु मामले को वांछित अंत तक पहुंचाया है। इस प्रकार पूरे संसार में उनकी छवि एक स्वीकार्य दिग्गज चेहरे की है।
ज़रीफ़ पर प्रतिबंध क्यों नहीं लग सकता?
ट्रम्प सरकार ने अपनी आयु के तीसरे वर्ष में यह दर्शा दिया है कि कम से कम विदेश नीति के मैदान में उसका व्यवहार संतुलित नहीं है। इसी आधार पर ईरान के विदेश मंत्री पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला और फिर उस फ़ैसले से पीछे हट जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। दूसरी ओर ज़रीफ़ पर प्रतिबंध लगाने से पीछे हटने के कारण ठीक वही हैं जो उन पर प्रतिबंध लगाने के हैं। ज़रीफ़, पिछले एक दशक में कूटनीति और उसकी उपयोगिता के प्रतीक हैं। उन पर प्रतिबंध, जो परमाणु समझौते के कारण पूरी दुनिया में पहचाने जाते हैं, केवल एक व्यक्ति पर प्रतिबंध नहीं है बल्कि अपने आपको कूटनीति का दावेदार बताने वाली एक शक्ति की ओर से कूटनीति पर ही प्रतिबंध है। ज़रीफ़ पर प्रतिबंध अमरीका को ईरानी जनता की नज़रों में अधिक घृणित बना देगा और यह ज़रीफ़ के तर्क के मुक़ाबले में वाॅशिंग्टन के असहाय होने का चिन्ह है।
ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंधों में विरोधाभास की नई लहर
वाइट हाउस ने ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध शुरू करके दावा किया था कि ये प्रतिबंध ईरानी जनता के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि सरकार के ख़िलाफ़ हैं लेकिन दवाओं और खाद्य सामग्री को भी प्रतिबंधों की सूची में डाल अमरीका ने यह दिखा किया कि उसकी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। दूसरी ओर ट्रम्प ने कई बार ईरान पर क्षेत्र में तनाव फैलाने का आरोप लगाया है जबकि अमरीका के समुद्री बेड़े कई हज़ार किलो मीटर का फ़ासला तैय करके इस क्षेत्र में पहुंचते हैं और सैन्य गतिविधियां अंजाम देते हैं। परमाणु समझौते के मामले में भी अमरीका, ऐसी स्थिति में ईरान पर उल्लंघन का आरोप लगाता है कि इस समझौते का उल्लंघन उसने ही समझौते से निकल कर शुरू किया है। ईरान के विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला भी अमरीका के व्यवहारिक विरोधाभासों का ताज़ा मामला है। अलबत्ता ज़रीफ़ को वीज़ा दिए जाने और संयुक्त राष्ट्र संघ में उनकी उपस्थिति के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि यह मामला अस्थायी रूप से ही सही अपने अंत को पहुंच गया है। (HN)