आयत क्या कहती है?
काफ़िरों को ख़ुश करने की कोशिश के बजाए, धर्म की शिक्षाओं के पालन का प्रयास करना चाहिए। ईश्वर पर भरोसा है जो ईमान वालों का सबसे बड़ा सहारा है।
क़ुरआन के सूरए अहज़ाब की आरंभिक तीन आयतों का अनुवाद और विशलेषण
- हे पैग़म्बर! (केवल) ईश्वर से डरिये और काफ़िरों व मिथ्याचारियों की बात न मानिये कि निश्चय ही ईश्वर सबसे बड़ा ज्ञानी (व) तत्वदर्शी है।
- और (हे पैग़म्बर!) जो चीज़ आपके पालनहार की ओर से आपकी ओर (विशेष संदेश द्वारा) भेजी गई है, उसी का पालन कीजिए कि निश्चय ही ईश्वर हर उस बात से अच्छी तरह अवगत है जो तुम लोग करते हो।
- और (हे पैग़म्बर!) ईश्वर पर भरोसा कीजिए कि वही भरोसे के लिए काफ़ी है।
इतिहास में वर्णित है कि अबू सुफ़ियान जैसे मक्के के कुछ बड़े अनेकेश्वरवादियों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहा कि अगर आप हमारे भगवानों पर टिप्पणी करना बंद कर दें तो हम भी आपको छोड़ देंगे और इस बात की अनुमति देंगे कि आप लोगों के बीच अपने धर्म का प्रचार करें।
ईश्वर इस आयत में अपने पैग़म्बर से कहता है कि वे इस प्रकार के षड्यंत्रकारी प्रस्तावों की ओर से सचेत रहें और धर्म के प्रचार के लिए इस्लाम के दुश्मनों से सांठ-गांठ न करें और कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष करना बंद न करें। अलबत्ता स्वाभाविक है कि दुश्मन भी षड्यंत्र करना बंद नहीं करेगा अतः हमेशा ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए और उसी से मदद मांगना चाहिए कि भरोसे के लिए वही काफ़ी है।
इन आयतों के पाठः
- धर्म के शत्रुओं से हर वह सांठ-गांठ जो उनकी मांगें मानने का कारण बने, ईश्वरीय भय से मेल नहीं खाती।
- आंतरिक मिथ्याचारियों व बाहरी दुश्मनों की सोच एक ही है, उनकी ओर से सचेत रहना चाहिए।
- काफ़िरों को ख़ुश करने की कोशिश के बजाए, धर्म की शिक्षाओं के पालन का प्रयास करना चाहिए, चाहे यह बात उन्हें बुरी ही क्यों न लगे।
- काफ़िरों व मिथ्याचारियों का अनुसरण न करने और ईश्वरीय आदेशों का आज्ञापालन करने से कुछ समस्याएं सामने आएंगी और इस संबंध में विरोधियों के मुक़ाबले में संयम व प्रतिरो के लिए सबसे मज़बूत सहारा, ईश्वर पर भरोसा है जो ईमान वालों का सबसे बड़ा सहारा है।