ट्रम्पिज़म के बाद के ईरान के बारे में कुछ अहम बातें ...
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संचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम से ईरान और ईरान के राजनैतिक धड़ों की स्थिति पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में काफ़ी चर्चा हो रही है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Nov ०६, २०२० १६:२७ Asia/Kolkata
  • ट्रम्पिज़म के बाद के ईरान के बारे में कुछ अहम बातें ...

संचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम से ईरान और ईरान के राजनैतिक धड़ों की स्थिति पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में काफ़ी चर्चा हो रही है।

हालिया घटनाओं के बारे में एक ध्यान योग्य बात यह थी कि अभी अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के निश्चित परिणाम सामने भी नही आए थे कि अचानक ही ईरान के सभी राजनैतिक धड़ों पर इन चुनावों के प्रभावों के बारे में मीडिया विशेष कर सोशल मीडिया में चर्चाएं होने लगीं। इस संबंध में कुछ बिंदुओं पर ध्यान देना ज़रूरी प्रतीत होता है।

  1. सबसे पहले जो बात स्पष्ट है कि वह यह है कि ट्रम्प के लिए दाहिने और बाएं धड़े का कोई फ़र्क़ नहीं था और उन्होंने सत्ता में आते ही पूरी व्यवस्था और ईरान को ही धराशायी करने की कोशिश शुरू कर दी थी और पिछले चार साल के दौरान उन्होंने ईरान और इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को नुक़सान पहुंचाने का कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं दिया। इस हिसाब से ईरान व इस्लामी व्यवस्था के दुश्मनों और क्रांति विरोधी गुटों का एक अहम सहारा चला गया है। वास्तव में ट्रम्प और ट्रम्पिज़म का ख़तरा पूरे ईरान के लिए एक ख़तरा था जो नेतनयाहू के नेतृत्व में ज़ायोनियों के संचालन और सऊदी अरब के पेट्रो डाॅलरों की मदद से ईरान को निशाना बनाए हुए था।
  2. दूसरे यह कि अमरीका के अत्याचारपूर्ण अधिकतम दबाव और ईरान की सरकारी व्यवस्था को गिराने की उसकी साज़िशों के मुक़ाबले में ईरान की कामयाबी का एक बड़ा कारण, आंतरिक स्तर पर मज़बूत एकता में वृद्धि थी और निश्चित रूप से यह उपलब्धि ट्रम्पिज़म के बाद के काल में भी ईरान की शक्ति को बढ़ाती रहेगी।
  3. तीसरे यह कि अतीत में धड़ेबंदी पर आधारित रवैये ने राष्ट्रीय हितों को बहुत नुक़सान पहुंचाया है। उदाहरण स्वरूप परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के समय इस विषय पर धड़ेबंदी हो जाने के कारण इसकी कमियों को समय पर दूर नहीं किया जा सका और अगर अब भी इस अनुभव पर ध्यान न दिया गया तो इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है।
  4. चौथे यह कि ईरान में सेंध लगानी की दुश्मन की साज़िश के विभिन्न पहलू हो सकते हैं और शायद इसी लिए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम मीडिया में आए भी नहीं हैं कि ईरान के विभिन्न धड़ों पर इसके प्रभाव की बहस छिड़ गई है। ऐसा लगता है कि ट्रिम्पिज़म के बाद के काल में ईरान में सेंध लगाने की साज़िश का एक लक्ष्य ईरान के अंदर और धड़ों के बीच मतभेद पैदा करना हो सकता है।
  5. पांचवें यह कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विकास एक आंतरिक मामला है और ईरान समेत सभी देशों में इसका मुख्य मैदान आंतरिक होता है लेकिन इसी के साथ अंतर्राष्ट्रीय मैदानों में जो अवसर व गुंजाइशें हासिल होती हैं उनसे भी भरपूर लाभ उठाया जाना चाहिए। विकास की प्रक्रिया धीमी व निरंतर होती है और देश के भविष्य को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ कर राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं बनाया जा सकता।

 

कुल मिला कर यह कि शायद इस समय ईरान के लिए सबसे अहम प्राथमिकता यह हो कि वह देश-विदेश की क़ानूनी गुंजाइशों से भरपूर व अधिकतम लाभ उठाए ताकि अत्याचारपूर्ण प्रतिबंध भी ख़त्म हो जाएं और इन बरसों में ईरान की जनता व सरकार को जो नुक़सान पहुंचा है, उसका हर्जाना भी हासिल किया जा सके। (HN)

 

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