"बहरैनी शासन धार्मिक नेताओं की गिरफ़्तारी से क्या लक्ष्य रखता है?"
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बहरीन का अल-खलीफ़ा शासन धार्मिक नेताओं ख़ासकर प्रमुख शिया विद्वानों की गिरफ़्तारी से कई उद्देश्य पूरे करता है। ये कदम व्यवस्थित दमन और धार्मिक मामलों को पूरी तरह सुरक्षा के दायरे में लाने का हिस्सा हैं। मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
(last modified 2026-06-07T10:51:25+00:00 )
Jun ०७, २०२६ १६:०० Asia/Kolkata

बहरीन का अल-खलीफ़ा शासन धार्मिक नेताओं ख़ासकर प्रमुख शिया विद्वानों की गिरफ़्तारी से कई उद्देश्य पूरे करता है। ये कदम व्यवस्थित दमन और धार्मिक मामलों को पूरी तरह सुरक्षा के दायरे में लाने का हिस्सा हैं। मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

 

  1.  सुरक्षाकरण और शिया समाज की नींव को कमजोर करना: शासन का सबसे बड़ा लक्ष्य शिया धर्मगुरुओं के सामाजिक, धार्मिक और प्रचार नेटवर्क को निष्क्रिय करना है ताकि समाज में आध्यात्मिक और मानसिक शून्यता पैदा की जा सके। उनके बयानों के अनुसार गिरफ़्तारियाँ धार्मिक प्रचार, इस्लामी रीति-रिवाजों और समाज की धार्मिक पहचान के लिए सीधा खतरा हैं – यह राजनीति पर नहीं बल्कि स्वयं धर्म पर प्रहार है।

 

2. "ईरानी एजेंट" का लेबल लगाकर दमन को सही ठहराना: बहरीन शासन बार-बार गिरफ़्तार लोगों पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) और "विलायत-ए-फ़क़ीह" के विचार से संबंध रखने का झूठा आरोप लगाता है ताकि आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमन को वैधता मिल सके और इसके भारी खर्चे को उचित ठहराया जा सके।

 

3. ईरान के खिलाफ हालिया युद्ध में सहयोग न करने वालों को दंडित करना: इन हमलों का एक प्रमुख उद्देश्य उन शियाओं को सज़ा देना है जिन्होंने अमेरिका-इज़राइल के ईरान के खिलाफ युद्ध में बहरीन की भागीदारी का समर्थन नहीं किया और अमेरिकी सैन्य ठिकानों को रसद सहायता देने से मना कर दिया।

 

4. शिया पहचान का सफाया और जनसंख्या-धार्मिक परियोजना: मानवाधिकार संगठनों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों ने जोर देकर कहा है कि यह दमन केवल राजनीतिक विरोधियों तक सीमित नहीं है बल्कि शिया समुदाय की धार्मिक और सामाजिक जड़ों को उखाड़ फेंकना और पूरे बहरीनी लोगों के अस्तित्व को नष्ट करना चाहता है। इस नीति में शिया विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और यहाँ तक कि उनके बच्चों की नागरिकता छीनना शामिल है।

 

5. अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा आरोपों को निराधार करार देना: अधिकांश पर्यवेक्षक और मानवाधिकार निकाय, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के दावे को राजनीतिक दमन का बहाना मानते हैं और बहरीन में इन कार्यों को बंद करने तथा नागरिक और धार्मिक स्वतंत्रताओं का सम्मान करने का आह्वान करते हैं।

 

कुल मिलाकर, ये गिरफ़्तारियाँ एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, जिसमें शिया समुदाय के धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव को खत्म करना, बहरीन को अमेरिकी-इजरायली धुरी के साथ पूर्ण तालमेल में लाना और भविष्य में किसी भी प्रकार के विरोध आंदोलन को बनने से रोकना शामिल है।

 

बहरीन शासन द्वारा शियाओं की गिरफ़्तारी

 

पार्स टुडे – बहरीन का अल-खलीफ़ा शासन धार्मिक नेताओं के दमन की नीति को जारी रखते हुए ऐसे ही कई और नेताओं को गिरफ़्तार कर चुका है।

 

धार्मिक नेताओं की गिरफ़तारी अल-खलीफ़ा शासन की कोई नई रणनीति नहीं है बल्कि इस शासन की आधी सदी पुरानी परंपरा का हिस्सा है लेकिन दमन की यह मात्रा और गिरफ़तार लोगों का दायरा अभूतपूर्व है। बहरीन मानवाधिकार संघ के प्रमुख, बाक़िर दरवेश ने कहा: "बहरीन के राजनीतिक इतिहास में शियाओं का यह दमन बेमिसाल है; गिरफ़तार लोगों में प्रमुख विद्वान, जुमा और जमाअत के इमाम, धार्मिक शिक्षण संस्थानों के ज़िम्मेदार, नजफ अशरफ और क़ुम मुकद्दस में धार्मिक प्राधिकारियों के प्रतिनिधि, हौज़ा के प्रोफेसर, धार्मिक वक्ता और प्रचारक शामिल हैं। साथ ही 'इस्लामिक काउंसिल ऑफ स्कॉलर्स' के कुछ संस्थापक सदस्य भी उनमें दिखते हैं जो आयतुल्लाह शेख ईसा क़ासिम की अध्यक्षता में काम करती थी।"

 

सवाल यह है कि अल-खलीफ़ा बहरीन के धार्मिक नेताओं के इस स्तर के दमन से क्या लक्ष्य रखता है?

 

अल-खलीफ़ा का मुख्य लक्ष्य भय और आतंक पैदा करके, अमेरिका और इज़राइल के ईरान के खिलाफ युद्ध और बहरीन में अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति के विरोध में जारी प्रदर्शनों को रोकना है। अल-खलीफ़ा शासन द्वारा मनमानी गिरफ्तारियों की यह व्यापक लहर, सुरक्षा-उन्मुख दृष्टिकोण में निरंतर वृद्धि और उन नागरिकों के खिलाफ व्यवस्थित दमन की नीति को दर्शाती है जिन्होंने अमेरिका और इज़राइल के ईरान के खिलाफ युद्ध और बहरीन पर उसके प्रत्यक्ष परिणामों से संबंधित अपने विचारों और राजनीतिक रुखों को शांतिपूर्वक व्यक्त करने का अपना अधिकार प्रयोग किया है। अतः यह व्यापक दमन जनता के विरोध को नियंत्रित करने का एक प्रयास है।

 

इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, धार्मिक विद्वानों का दमन और गिरफ्तारी अल-खलीफ़ा के एजेंडे में गंभीरता से शामिल कर दी गई है। धार्मिक विद्वान समाज में व्यापक जनविश्वास और एक बड़ा संचार नेटवर्क रखते हैं। कई समाजों में, मस्जिद, हुसैनिया और मिंबर जनता की राय के निर्माण के केंद्र होते हैं। धार्मिक नेताओं की गिरफ्तारी बहरीन के समाज पर धर्मगुरुओं के प्रभाव और निगरानी को रोकने के उद्देश्य से की जाती है।

 

अल-खलीफ़ा का एक अन्य उद्देश्य बहरीन के समाज से शियापन का सफाया करना है। बहरीन से शियाओं का सफाया अल-खलीफ़ा की सदियों पुरानी रणनीति रही है क्योंकि शिया इस देश के समाज का बहुमत हैं और अल-खलीफ़ा पिछली सदी से बहरीन के जनसंख्या संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास कर रहा है। यद्यपि अल-खलीफ़ा धार्मिक हिंसा शियाओं और स्वतंत्र-विचारशील सुन्नियों दोनों पर लागू करता है लेकिन अब गिरफ़तार किए गए अधिकतर नेता शिया समुदाय से हैं।

 

बहरीन मानवाधिकार संघ के प्रमुख, बाक़िर दरवेश ने कहा: "गृह मंत्रालय के बयान धार्मिक शिक्षण संस्थानों, हुसैनी परिषदों, मस्जिदों, हुसैनियों, इस्लामी संस्थानों और यहां तक कि धार्मिक कानून फ़िक्ह के फैसलों की भूमिका के बारे में बात करते हैं; यह दर्शाता है कि शासन शियाओं से जुड़े इन सभी केंद्रों के खिलाफ प्रतिबंधों के एक व्यापक अभियान के लिए जमीन तैयार कर रहा है।"

 

अंतिम बात यह है कि यद्यपि अल-खलीफ़ा दमन तेज करके भय और आतंक का माहौल बना सकता है और अस्थायी रूप से विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित कर सकता है लेकिन लंबी अवधि में इस प्रकार के कदम उल्टा असर डालते हैं और शासन के संकट को और बढ़ा देते हैं। mm