7 रमज़ानः क़ुरआन नाज़िल करने का मुख्य लक्ष्य ही चिंतन है
सातवीं रमज़ान की दुआ का अनुवादः हे मेहरबान आज के दिन रोज़ा रखने और नमाज़ पढ़ने में मेरी सहायता कर! लड़खड़ाहटों और गुनाहों से मुझे दूर कर दे। आज के दिन तुझे हर लम्हा लगातार याद रखने में मेरी मदद कर। तेरी ओर से मदद की आशा के साथ। हे रास्ता भटक जाने वालों को सही रास्ता दिखाने वाले!
हम मेहरबान ईश्वर का शुक्रर अदा करते हैं कि उसने अपनी बेपनाह नेमतों से हमको नवाज़ा और हम पर यह उपकार किया कि एक बार फिर रमज़ान के महीने की बरकतों को महसूस करें। चौदह सौ साल पहले जब हेजाज़ के पूरे इलाक़े पर जेहालत की काली छाया थी, पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि रोज़ा रखो ताकि स्वस्थ हो जाओ। अलग अगल धर्मों में यह बात कही गई है कि रोज़ा इंसान की आत्मा और शरीर दोनों के लिए लाभदायक है। आज के कार्यक्रम में हम पिछले युगों में रोज़ा और रमज़ान की क्या स्थिति थी इस बारे में बात करेंगे।
इस्लाम से पहले ईसाई धर्म में भी रोज़ा और रोज़ादारी का सिलसिला रहा बल्कि यहूदी धर्म में भी यह प्रचलित था। यहां तक कि ग़ैर आसमानी धर्मों में भी कुछ विशेष दिनों में खाना पीना छोड़ देने की सिफ़ारिश की गई है। प्राचीन यूनान में लोग बीमारी के इलाज के लिए मशहूर पूजा स्थल पर जाते थे और स्नान के बाद रोज़ा रखते थे और बीमरियों से नजात देने वाले विशेष ख़ुदा से अपनी बीमारी ठीक होने की दुआ मांगते थे।
हिंदू धर्म बड़ा प्राचीन धर्म है जो तीन या चार हज़ार साल ईसा पूर्व पूर्वी इलाक़ों में प्रचलित हुआ। इस धर्म के मानने वाले नए महीने के पहले दिन और धार्मिक समारोहों के अवसर पर रोज़ा या व्रत रखते हैं। हिंदू धर्म में रोज़ा रखने के कई तरीक़े हैं। एक रोज़ा वह है जिसमें ग़ैर तरल चीज़ें खाने से परहेज़ किया जाता है और एक रोज़ा वह होता है जिसमें कुछ भी खाया पिया नहीं जाता। यह चौबीस घंटे का होता है। हर व्यक्ति ख़ुद निर्णय लेता है कि उसे किस प्रकार का रोज़ा रखना है। इस रोज़े का मक़सद मन और अस्तित्व को पाक बनाना और सोच में पवित्रता पैदा करना होता है। बौद्ध धर्म में आम तौर पर हर महीने की चौदह तारीख़ को रोज़ा रखा जाता है जिसमें केवल तरल वस्तुएं ही प्रयोग की जाती हैं। मानी धर्म के माने वाले भी रोज़ादारी को बड़ा महत्व देते हैं। इस धर्म के मानने वाले दो प्रकार के रोज़े रखते हैं। एक रोज़ा वह होता है जिसमें दो दिन तक खाने पीने से परहेज़ किया जाता है और दूसरा रोज़ा वह होता है जिसमें सुबह से सूर्यास्त तक खाने पीने से परहेज़ किया जाता है। मानी धर्म के लोग अपने उपासना स्थलों को मानिस्तान कहते हैं। हर उपासना स्थल में पांच हाल होते हैं जिनमें एक हाल रोज़ा रखने वालों और उनकी दुआओं के लिए विशेष होता है। मानी धर्म के लोग खगोल शास्त्र की मदद से रोज़े के महीने का निर्धारण करते थे और इस महीने के आख़िर में ईद मनाते थे। ईद को बेमा कहा जाता था। इस दिन लोग मानी की तसवीर हाथ में लेकर अपने अपने गुनाहों का इक़रार करते थे। कुछ पुस्तकों में तो यहां तक मिलता है कि मूर्तियों की पूरा करने वाले भी रोज़ा रखते थे।
लगभग इतिहास के हर युग में और हर जाति व संस्कृति में रोज़ादारी दिखाई देती है। क्या वजह है कि रोज़ादारी का इतिहास इतना पुराना है? इसकी वजह शायद कुछ रवायतों में मिल सकती है। इन रवायतों के आधार पर सबसे पहला इंसान जिसने रोज़ा रखा वह हज़रत आदम थे। जब हज़रत आदम ने प्रतिबंधित फल खाया तो वह फल तीस दिन तक उनके पेट में रहा। इसके बाद अल्लाह ने हज़रत आदम और उनकी औलाद पर तीस दिन भूखा और प्यासा रहना अनिवार्य कर दिया। तो रोज़ादारी एक ज़िम्मेदारी है जो हज़रत आदम से मिली है। हो सकता है कि लोग समय गुज़रने के साथ गुमराह हो गए हों मगर उनके बीच परम्पराएं सुरक्षित रहीं। अलबत्ता इन परम्पराओं को अदा करने की शैली अलग अलग थी।
इस्लामी ज्ञानों के विशेषज्ञों के बीच एक दिलचस्प बहस यह भी है कि पिछली क़ौमों में रमज़ान के महीने को रमज़ान ही कहा जाता था या नहीं। कुछ का मानना है कि रमज़ान नाम इस्लाम आने से बहुत पहले इस महीने के लिए इस्तेमाल होता था। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि जब महीनों के नाम पुरानी भाषा से बदल कर नई भाषा में रखे जा रहे थे तब हर महीने का नाम उसके वातावरण के आधार पर रखा गया। जैसे रमज़ान का नाम भीषण गर्मी की वजह से रमज़ान रखा गया। लेकिन अभी हम जो साक्ष्य आपके सामने पेश करेंगे उनसे ज़ाहिर होता है कि इस्लाम से पहले भी रमज़ान को इसी नाम से जाना जाता था। पहली बात तो यह है कि महीनों के नाम बदलने की घटना इस्लाम से पहले की है। दूसरी बात यह है कि इस्लाम से पहले अज्ञानता के दौर में लोग हज उसके विशेष महीने ज़िलहिज्जा में अंजाम देते थे और इसका नाम भी जानते थे। तीसरी बात यह है कि जिन महीनों को हराम महीना कहा गया है यानी जिनमें कुछ कामों को हराम समझा जाता था वे महीने सबके लिए बहुत जाने पहचाने थे। चौथी बात यह है कि क़ुरआन ने भी सूरए बक़रा की आयत 185 में रमज़ान की तरफ़ इशारा किया है और कहा है कि रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन नाज़िल हुआ लोगों की हिदायत के लिए और सत्य व असत्य के फ़र्क़ को स्पष्ट करने के लिए। यह सारी चीज़ें बताती हैं कि यह महीने लोगों के लिए बहुत जाना पहचाना था।
आम तौर पर जब भी कोई क़ौम मायूसी का शिकार हो जाती थी तो मन्नत मानती थी कि मायूसी दूर करने और सफलता हासिल करने के लिए रोज़ा रखेगी, अल्लाह की इबादत करेगी। इस काम से लोग अल्लाह के सामने अपनी बेबसी का इक़रार करते थे, अपने पापों का इक़रार करते थे और अल्लाह की प्रसन्नता हासिल कर लेते थे। अल्लाह सूरए बक़रह की आयत संख्या 183 में इस्लाम से पहले के धर्मों में रोज़ा वाजिब होने की बात कहता है। आयत कहती है कि हे ईमान लाने वालो! रोज़ा तुम पर वाजिब किया गया है उसी तरह जिस तरह तुमसे पहले के लोगों पर वाजिब था ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ। उपदेश और तबलीग़ की शैली यह होती है कि कठिन काम को भी आसान बताया जाता है। यह आयत कहती है कि रोज़ा केवल तुम मुसलमानों पर वाजिब नहीं है बल्कि पिछली क़ौमों पर भी यह क़ानून लागू था। ज़ाहिर है कि उस नियम पर अमल करना आसान होता है जिस पर अमल करना सभी क़ौमों का फ़र्ज़ रहा हो। इस आयत से यह संदेश मिलता है कि इबादत का उद्देश्य इंसान के व्यक्तित्व का संवारना है। रोज़ा रखने से परहेज़गारी आती है। रोज़ा रूह की परवरिश का ज़रिया है और इससे इंसान जीवन के हर मैदान में परहेज़गार बनता है।
यह वाजिब दूसरे धर्मों में भी रहा है। ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट में भी रोज़ा के बारे में बातें बयान की गई हैं। पोलस की इंजील में आया है कि हमेशा और संप्रदाय और हर क़ौम में दुख और आकस्मिक पीड़ा आने के समय रोज़ा रखने की प्रथा रही है। लूक़ा की इंजील में कहा गया है कि हज़रत ईसा ने अपने शागिर्दों को आदेश दिया कि उनके निधन के बाद रोज़ा रखें। तौरैत में भी लिखा है कि हज़रत मूसा ने 40 दिन रोज़ा रखा। तौरैत में अन्य स्थान पर कहा गया है कि यहूदी क़ौम जब विनम्रता ज़ाहिर करना चाहती थी तो रोज़ा रखती थी ताकि इस तरह अल्लाह को ख़ुश करे।
क़ुरआन महान ग्रंथ है। अगर पाकीज़ा मन से इसकी आयतों के बारे में चिंतन किया जाए तो हमारी आंखों के सामने से पर्दे हटेंगे और तथ्य सामने आएंगे, शर्त यह है कि हम पूरी जानकारी और चेतना के साथ इसकी आयतों के बारे में चिंतन करें। रमजान के इन पवित्र दिनों में हमने क़ुरआन की तिलावत और उसकी आयतें पढ़कर एक बड़ा क़दम उठाया है। अब वक़्त आ गया है कि हम अधिक बुनियादी क़दम उठाएं और इसकी शिक्षाओं के बारे में गहराई से चिंतन करें और तमाम कठिनाइयों और जटिलताओं से ख़ुद को बाहर निकालें जिन्होंने मानव जीवन को कठिन बना दिया है। आज विचारकों को यक़ीन हो चला है कि इस आसमानी किताब में जगह जगह बहुत सारे रहस्य छिपे हैं जिन्हें गहरे अध्ययन और चिंतन से ही समझा जा सकता है। अल्लाह सूरए साद की आयत 29 में कहता है कि यह बरकत वाली किताब है जो तुम पर हमने नाज़िल की है ताकि लोग इसकी आयतों पर ग़ौर करें और समझदार लोग सचेत हों।
अल्लाह ने इस आयत में कहा है कि क़ुरआन नाज़िल करने का मुख्य लक्ष्य ही चिंतन है ताकि लोग केवल क़ुरआन पढ़ने को काफ़ी न समझ बैठें। चिंतन का मतलब है हालात और घटनाओं के अंजाम के बारे में सोचना और ग़ौर करना। क़ुरआन की आयतों पर चिंतन करने का मतलब है क़ुरआन में दिए गए उपदेशों और शिक्षाओं से पाठ लेना और वास्तविक ज्ञान व बोध हासिल करना। अल्लाह के कलाम पर चिंतन करना और क़ुरआन के तथ्यों और वास्तविकताओं को समझने के लिए पर्दों को हटाना अल्लाह की बरकतें हासिल करने का सबसे उत्तम मार्ग है। क़ुरआन उन लोगों की निंदा करता है जो अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर किए बग़ैर यह आशा रखते हैं कि उनके दिलों में ताज़गी और ज्योति पैदा हो। क़ुरआन उन पर ताकीद करता है कि क़ुरआन के बारे में ग़ौर करें। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस बारे में कहते हैं कि क़ुरआन की आयतों के बारे में ग़ौर करो क्योंकि क़ुरआन के बारे में चिंतन दिलों की बहार है।
रमज़ान के महीने में अल्लाह से हम गिड़गिड़ाकर दुआ करते हैं कि हमें क़ुरआन की तिलावत करने और उसके अर्थों को समझने और उसकी शिक्षाओं पर अमल करने में कामयाब बनाए। इसी के साथ अगले कार्यक्रम तक आपसे अनुमति चाहते हैं।