ज़ायोनी सेना में आत्महत्या के आंकड़े चरम पर क्यों?
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पार्स टुडे: ज़ायोनी सेना ने दर्जनों सैनिकों की आत्महत्या को स्वीकार करते हुए, चालू वर्ष के दौरान 151 सैनिकों के मारे जाने की बात कबूली है।
(last modified 2026-01-06T10:38:50+00:00 )
Jan ०१, २०२६ १८:२४ Asia/Kolkata
  • ज़ायोनी सेना में आत्महत्या के आंकड़े चरम पर क्यों?
    ज़ायोनी सेना में आत्महत्या के आंकड़े चरम पर क्यों?

पार्स टुडे: ज़ायोनी सेना ने दर्जनों सैनिकों की आत्महत्या को स्वीकार करते हुए, चालू वर्ष के दौरान 151 सैनिकों के मारे जाने की बात कबूली है।

पार्स टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, ज़ायोनी सेना ने वर्ष 2025 में अपने हताहतों का संक्षिप्त विवरण जारी किया है। इस रिपोर्ट में आत्महत्या के कारण मौत के बढ़ते मामलों ने सबसे अधिक ध्यान खींचा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 21 से अधिक इज़रायली सैनिक आत्महत्या के कारण मारे गए हैं, जो पिछले वर्षों के आंकड़ों की तुलना में आत्महत्या की सबसे उच्च संख्या है।

 

ज़ायोनी शासन की सेना ने कहा है कि ज़ायोनी सैनिकों में बढ़ती मानसिक विक्षिप्तता से निपटने के लिए उसे चिकित्सा सेवाओं का विस्तार करना होगा।

 

इज़रायली सेना द्वारा वर्ष 2025 के हताहतों के आधिकारिक आंकड़ों का प्रकाशन, एक बार फिर उस वास्तविकता को उजागर करता है जिसे सालों तक जनता से छुपाने का प्रयास किया गया था। सैन्य हताहतों के विभिन्न प्रकारों में, चाहे वह अभियानों में मृत्यु हो, बीमारी से मौत हो या दुर्घटना में मृत्यु, आत्महत्याओं के बढ़ते मामले एक चिंताजनक विषय हैं। यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत या मनोवैज्ञानिक मुद्दा है, बल्कि ज़ायोनी शासन की संरचनात्मक और राजनीतिक संकटों की परछाई भी है; एक ऐसा संकट जो इज़रायल की सेना और समाज की विभिन्न परतों में घुस चुका है और अब आधिकारिक आंकड़ों के रूप में प्रकट हो रहा है।

 

इज़रायली सेना में आत्महत्या बढ़ने का एक कारण फिलिस्तीनियों और क्षेत्र के खिलाफ थकाऊ और अंतहीन युद्धों से उत्पन्न दबाव के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ज़ायोनी सैनिक ऐसी परिस्थितियों में अपने मिशन पूरे कर रहे हैं जहां न तो संघर्षों के समाप्त होने की कोई स्पष्ट संभावना है और न ही उन मिशनों का कोई सार्थक औचित्य है। यह स्थिति, जन प्रतिरोध और संरचनात्मक हिंसा के दैनिक सामने आने के साथ मिलकर, ज़ायोनी सैनिकों को मनोवैज्ञानिक क्षय और निरर्थकता की भावना के सामने खड़ा कर रही है। यहाँ तक कि ज़ायोनी शासन की सेना के प्रवक्ता ने भी अपनी ताज़ा रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि आत्महत्या के सूचकांक एक ऐसे स्तर पर पहुँच गए हैं जिसके लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक हस्तक्षेप की आवश्यकता है; एक ऐसा स्वीकारोक्ति जो दर्शाता है कि संकट व्यक्तिगत स्तर से आगे बढ़कर एक संस्थागत समस्या बन गया है।

 

इस संदर्भ में गज़ा युद्ध और उसके परिणामों की सीधी भूमिका पर विशेष ध्यान देना चाहिए। गज़ा युद्ध ने ज़ायोनी शासन के लिए न केवल सैन्य रूप से भारी लागत वहन की है, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी ज़ायोनी सैनिकों पर दोहरा दबाव डाला है।

 

युद्ध की लंबी अवधि और उसके समापन का अनिश्चित समय, गज़ा में फिलिस्तीनियों विशेषकर महिलाओं और बच्चों के व्यापक नरसंहार और वैश्विक जनमत के दबाव ने ज़ायोनी सैनिकों में आत्महत्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा, ईरान के खिलाफ ज़ायोनी शासन के 12-दिवसीय युद्ध ने भी ज़ायोनी बलों के मनोबल पर गंभीर प्रहार किया। कई ज़ायोनी सैनिकों को मजबूरी में इस लड़ाई में भाग लेना पड़ा और इसमें हार ने यहाँ तक कि वरिष्ठ ज़ायोनी सैनिकों के मनोबल को भी गंभीर रूप से कमजोर कर दिया, उन्हें पहले से कहीं अधिक अवसाद और निराशा में डाल दिया।

 

मनोवैज्ञानिक दबावों के साथ-साथ, ज़ायोनी सेना की संरचनात्मक कमजोरी ने भी आत्महत्याओं के बढ़ते संकट को हवा दी है; इतना कि ज़ायोनी सेना को विभिन्न इकाइयों में एक हजार से अधिक मानसिक स्वास्थ्य अधिकारियों को तैनात करने और यहाँ तक कि तत्काल हस्तक्षेप टीमों को युद्ध क्षेत्रों में भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह कदम, किसी कार्यकुशलता का संकेत होने के बजाय, मनोवैज्ञानिक समस्याओं की समय रहते रोकथाम और प्रबंधन में विफलता को दर्शाता है। ज़ायोनी शासन की सेना की मानसिक स्वास्थ्य शाखा के एक अधिकारी ने इस संबंध में स्पष्ट किया: "ऑपरेशन अल-अक्सा तूफान के बाद, सभी स्तरों पर मनोवैज्ञानिक सेवाओं की मांग में उछाल आया है और कई इकाइयों के सैनिक अवसाद के लक्षणों का सामना कर रहे हैं।"

 

दूसरी ओर, सैन्य हताहतों के संबंध में ज़ायोनी शासन की मीडिया सेंसरशिप और गोपनीयता हमेशा से जनमत नियंत्रण की नीति का हिस्सा रही है। लेकिन आत्महत्याओं के आधिकारिक आंकड़ों का प्रकाशन दर्शाता है कि संकट का दायरा इतना बढ़ गया है कि अब उसे छुपाना संभव नहीं रह गया है। आधिकारिक बयान और मैदानी हकीकत के बीच की यह खाई, इज़रायली समाज के ज़ायोनी सेना में अविश्वास को और बढ़ा रही है।

 

निरंतर युद्धों और संघर्षों से उत्पन्न मनोवैज्ञानिक दबावों के अलावा, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कारक भी ज़ायोनी सैनिकों के मनोवैज्ञानिक संकट में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इज़रायल की सैन्य संरचना, जो काफी हद तक अनिवार्य और दीर्घकालिक सैन्य सेवा पर निर्भर करती है, सैनिकों में निरर्थकता और मानसिक थकान की भावना पैदा कर सकती है। सैन्य कार्य वातावरण, जिसमें कठोर अनिवार्यताएं और व्यक्तिगत प्रतिबंध हैं, साथ ही इज़रायली समाज में मौजूद सामाजिक दबाव ने जिनमें असमानताएं, आर्थिक समस्याएं और सांस्कृतिक तनाव शामिल हैं, भी मानसिक समस्याओं को बढ़ावा दिया है।

 

दूसरी ओर, ज़ायोनी शासन द्वारा इस तरह के आंकड़ों की घोषणा को इस शासन की सामाजिक और राजनीतिक एकजुटता के क्रमिक पतन का संकेत माना जाना चाहिए। जिन सैनिकों ने अपनी आशा खो दी है, वे समाज के स्तर पर गहरे संकट की परछाई हैं; एक ऐसा संकट जो कब्जे और भविष्यहीन सुरक्षा-केंद्रित नीतियों से उपजा है। भले ही ज़ायोनी सेना मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ इस रुझान को नियंत्रित करने का प्रयास करे, लेकिन जब तक संकट की जड़ें यानी कब्जे और युद्ध की निरंतरता और राजनीतिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य का अभाव बना रहेगा, आत्महतियाँ जारी रहेंगी। यह वास्तविकता, एक मानवीय मुद्दे से कहीं अधिक, एक राजनीतिक सूचक है जो दर्शाता है कि हिंसा पर टिका एक शासन, देर-सवेर उसी हिंसा के अपने आंतरिक हिस्सों में लौट आने का सामना करेगा। (AK)

 

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