मानवीय संकट, ग़ाज़ा के बच्चे और अंतरराष्ट्रीय उपेक्षा
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पार्स टुडे- यूनिसेफ़ ने घोषणा की है कि ग़ाज़ा में ज़ायोनी शासन द्वारा युद्धविराम का उल्लंघन किए जाने से 100 से अधिक बच्चे शहीद हो गए हैं। इस संगठन ने ग़ाज़ा की स्थिति के और अधिक बिगड़ने को लेकर भी चेतावनी दी है।
(last modified 2026-01-16T08:13:41+00:00 )
Jan १५, २०२६ १७:५२ Asia/Kolkata
  • ग़ाज़ा के बच्चों का नरसंहार
    ग़ाज़ा के बच्चों का नरसंहार

पार्स टुडे- यूनिसेफ़ ने घोषणा की है कि ग़ाज़ा में ज़ायोनी शासन द्वारा युद्धविराम का उल्लंघन किए जाने से 100 से अधिक बच्चे शहीद हो गए हैं। इस संगठन ने ग़ाज़ा की स्थिति के और अधिक बिगड़ने को लेकर भी चेतावनी दी है।

पार्स टुडे की रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनिसेफ़ ने बताया कि ग़ाज़ा में ज़ायोनी शासन द्वारा संघर्षविराम के उल्लंघन के कारण 100 से अधिक बच्चों की शहादत हुई है। यूनिसेफ़ के प्रवक्ता ने ग़ाज़ा में मानवीय हालात के बिगड़ने की चेतावनी देते हुए पिछले कुछ दिनों में भीषण ठंड के कारण 6 बच्चों की मौत तथा आश्रय और हीटिंग के साधनों की गंभीर कमी की ओर इशारा किया।

 

यूनिसेफ़ की चेतावनी ज़मीनी सच्चाई का केवल एक हिस्सा है ऐसी सच्चाई जो दिखाती है कि संघर्षविराम की घोषणा के बाद भी ग़ज़ा के बच्चे इज़राइली हमलों से सुरक्षित नहीं रहे हैं। यह रिपोर्ट एक और व्यापक त्रासदी की संक्षिप्त तस्वीर पेश करती है; ऐसी त्रासदी जिसमें न केवल संघर्षविराम का पालन नहीं किया गया, बल्कि सहायता पहुँचाने के रास्तों को भी व्यवस्थित रूप से बंद कर दिया गया और मानवीय संगठनों को ग़ाज़ा में काम करने से रोका गया।

 

ग़ाज़ा के निवासी अब दो वर्षों से अधिक समय से जर्जर और अकल्पनीय परिस्थितियों में फटे-पुराने तंबुओं में रह रहे हैं और कंबलों, हीटिंग के साधनों, सर्दियों के कपड़ों, दवाइयों और भोजन की भारी कमी से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में राहत संगठनों की गतिविधियों पर प्रतिबंध का अर्थ वास्तव में ग़ज़ा के निवासियों को धीरे-धीरे मौत के हवाले कर देना है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें बताती हैं कि ग़ज़ा में खाद्य असुरक्षा उस स्तर पर पहुँच चुकी है जिसे केवल गरीबी का परिणाम नहीं कहा जा सकता; यह स्थिति सीधे तौर पर सहायता के प्रवेश को रोकने का नतीजा है। ज़ायोनी शासन द्वारा सैकड़ों सहायता ट्रकों के प्रवेश की अनुमति देने के वादे व्यवहार में कभी पूरे नहीं हुए और वास्तव में पहुँची सहायता की मात्रा मानवीय आवश्यकताओं से बहुत कम है। यह अंतर सैकड़ों हज़ार लोगों को कुपोषण के खतरे में डाल रहा है और बच्चों को सबसे अधिक नुकसान पहुँचा है।

 

स्वास्थ्य प्रणाली भी पूर्ण पतन के कगार पर है। अस्पताल आवश्यक दवाओं की कमी, आपातकालीन सेवाओं के अभाव और डॉक्टरों व चिकित्सा कर्मियों की कमी का सामना कर रहे हैं। ग़ाज़ा के शिफ़ा चिकित्सा केंद्र के निदेशक मोहम्मद अबू सलमिया ने ज़ोर देकर कहा है कि क़ब्ज़ाधारियों द्वारा दवाइयों और चिकित्सीय उपकरणों के प्रवेश को लगातार रोके जाने के कारण इस शहर में स्वास्थ्य संकट बेहद गंभीर हो गया है।

 

ग़ाज़ा में इज़राइल के लगातार हमले यह दर्शाते हैं कि यह शासन हिंसा रोकने के प्रति किसी भी तरह की प्रतिबद्धता नहीं रखता और यहाँ तक कि उन अवधियों में भी जब उसने युद्ध रोकने सहित संघर्षविराम की शर्तों का पालन करने का दावा किया है तब भी ग़ाज़ा के नागरिकों को निशाना बनाता रहा है और उनकी जान लेता रहा है। इस बीच बच्चे सबसे पहले और सबसे असहाय शिकार हैं। ऐसी कार्रवाइयाँ अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों का खुला उल्लंघन हैं वे क़ानून जो हर परिस्थिति में नागरिकों, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा पर ज़ोर देते हैं। इसके बावजूद इज़राइल अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और संधियों की अनदेखी करते हुए इस प्रक्रिया को जारी रखता है।

 

यह स्थिति तब है जब ग़ज़ा में इज़राइल द्वारा बार-बार किए गए उल्लंघन न तो छिटपुट चूक हैं और न ही ज़मीनी गलतियाँ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के मुख्य स्तंभों को तोड़ना हैं। जिनेवा संधियाँ विशेष रूप से साझा अनुच्छेद 3 और अतिरिक्त प्रोटोकॉल स्पष्ट रूप से नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता तक पहुँच की गारंटी और सामूहिक दंड पर प्रतिबंध की आवश्यकता पर ज़ोर देती हैं। बच्चों पर हमला, दवाइयों और भोजन के प्रवेश को रोकना और राहत संगठनों की गतिविधियों को सीमित करना, युद्ध अपराध और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के गंभीर उल्लंघन के स्पष्ट उदाहरण हैं। ये कार्रवाइयाँ न केवल मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हैं, बल्कि उन संधियों के दर्शन से भी असंगत हैं जिन्हें मानवीय त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए बनाया गया था। इसके बावजूद इज़राइल खुलेआम इन क़ानूनों की अनदेखी करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एक हिस्से की चुप्पी और समर्थन व्यवहार में इन उल्लंघनों को वैधता प्रदान करता है।

 

दूसरी ओर मानवीय संगठनों की गतिविधियों पर प्रतिबंध और सहायता पहुँचाने के रास्ते में बाधा डालना जिनेवा संधि के प्रथम अतिरिक्त प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 54 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है जो नागरिकों के जीवन के लिए आवश्यक संसाधनों पर किसी भी प्रकार के हमले या अवरोध को निषिद्ध करता है। अंतरराष्ट्रीय कर्मियों के प्रवेश को रोकना, मार्गों को बंद करना और राहत कार्यों को सीमित करना, वस्तुतः भूख और वंचना को युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के समान है एक ऐसा कृत्य जिसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून में युद्ध अपराध माना जाता है। इसके अतिरिक्त ग़ाज़ा की दीर्घकालिक घेराबंदी और युद्ध के दौरान उसका और कड़ा होना, सामूहिक दंड का स्पष्ट उदाहरण है। इसके बावजूद, इज़राइल कानूनी परिणामों की परवाह किए बिना इन सिद्धांतों का उल्लंघन जारी रखता है; ऐसी स्थिति जो न केवल अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करती है बल्कि यह भी दिखाती है कि मानवाधिकार और स्वतंत्रता के बारे में पश्चिमी देशों के नारे कितने खोखले और आधारहीन हैं।

 

इस बीच अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों की भूमिका भी गंभीर रूप से सवालों के घेरे में है। उनका दायित्व संघर्षविराम के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना, मार्गों को खोलना और सहायता के प्रवेश के लिए परिस्थितियाँ तैयार करना है लेकिन व्यवहार में इज़राइल की आक्रामक नीतियों का मुकाबला करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। इस निष्क्रियता का परिणाम सर्दी में ग़ाज़ा के बच्चों का जमकर मर जाना, बिना दवाइयों वाले अस्पतालों में रोगियों की मौत और उस पीड़ा का विस्तार है जो हर दिन और गहरी होती जा रही है।

 

अंत में ग़ाज़ा में जो हो रहा है उसके प्रति वैश्विक समुदाय की चुप्पी केवल निष्क्रिय उदासीनता नहीं है बल्कि किसी न किसी रूप में उसी अपराध में सहभागिता है जिसकी निंदा की जानी चाहिए। जब बड़ी शक्तियाँ, संघर्षविराम के उल्लंघन, बच्चों के नरसंहार, सहायता की नाकेबंदी और नागरिक जीवन के पूर्ण पतन के स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद, निर्णायक रुख अपनाने से इनकार करती हैं, तो यह चुप्पी स्वयं त्रासदी को जारी रखने का साधन बन जाती है। प्रतीत होता है कि आज पश्चिम की चुप्पी किसी त्रासदी की हाशिया नहीं, बल्कि उसके मूल पाठ का ही हिस्सा है। MM