मानवाधिकार के हनन के कारण सऊदी अरब की बढ़ती आलोचना
मानवाधिकार के हनन के कारण सऊदी अरब की तानाशाही सरकार की निंदा का दायरा बढ़ता जा रहा है।
तानाशाही का दुर्ग कहलाने वाला सऊदी अरब, संसार में मानवाधिकार का सबसे अधिक हनन करने वालों में से एक है। सऊदी सरकार न केवल देश के भीतर बल्कि बाहर भी मानवाधिकार पर तनिक भी ध्यान नहीं देती। सऊदी अरब के अंदर महिलाओं के अधिकारों का खुल कर हनन किया जाता है। उन्हें ड्राइविंग का अधिकार नहीं है और मतदान का अधिकार भी हाल ही में मिला है लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं किया गया है। इस देश में मीडिया, आले सऊद की तानाशाही सरकार के नियंत्रण में है और सभी संचार माध्यमों पर राजशाही परिवार का स्वामित्व है। शाही परिवार की आलोचना को अपराध माना जाता है और शिया मुसलमानों के साथ खुल कर भेदभाव किया जाता है।
सऊदी अरब के इस प्रकार के अमानवीय व्यवहार के बावजूद, प्रजातंत्र और मानवाधिकार का दावा करने वाली सरकारें न केवल यह कि इस देश के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहींं करतीं बल्कि उसका समर्थन ही करती हैं। इसका एक उदाहरण सऊदी अरब को संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार परिषद का प्रमुख बनाया जाना है जिसे टीकाकारों ने कटु राजनैतिक व्यंग्य कहा है। अलबत्ता सऊदी अरब द्वारा मानवाधिकार के हनन और पश्चिमी देशों द्वारा उसके समर्थन की ग़ैर सरकारी संस्थाओं ने हमेशा आलोचना की है। ब्रिटेन के नागरिक कार्यकर्ताओं ने इस देश की प्रधान मंत्री थेरेसा मे से मांग की है कि सऊदी अरब को राष्ट्र संघ की मानवाधिकार परिषद का पुनः प्रमुख बनाए जाने का विरोध किया जाए। ह्यूमन राइट्स वाॅच ने भी एक बयान जारी करके अमरीकी कांग्रेस से मांग की है कि सऊदी अरब को लगभग सवा अरब डाॅलर के हथियार बेचने के सरकार के समझौते का विरोध करें। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाख़ारोवा ने भी यमन में आम नागरिकों के विरुद्ध सऊदी अरब के अपराधों पर गहरी चिंता जताते हुए इन अपराधों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जांच कराए जाने की मांग की है। (HN)