संयुक्त राष्ट्रसंघ और यमन संकट
राष्ट्रसंघ में यमन के विशेष प्रतिनिधि का कहना है कि अब उन्हें सच कहने का भी अधिकार नहीं रहा है।
मुहम्मद अब्दुस्सलाम ने यमन के अलमसीरा टीवी चैनेल को दिये साक्षात्कार में कहा कि राष्ट्रसंघ चाहता है कि हम कुवैत वार्ता से पहले वाले चरण में चले जाएं। उन्होंने कहा कि इससे यह पता चलता है कि यह अन्तर्राष्ट्रीय संगठन भूल बैठा है कि यमन एक बहुत ही गंभीर मानवीय एवं आर्थिक संकट में घिरा हुआ है। उन्होंने कहा कि अब हमें सच बोलने का अधिकार नहीं रहा है।
यमन पर मार्च 2015 से सऊदी अरब के हमले जारी हैं जिन्हें अमरीका और ब्रिटेन का समर्थन प्राप्त है। वैसे तो यह हमले यमन के भगोड़े राष्ट्रपति मंसूर हादी को पुनः सत्ता में वापस लाने के बहाने से आरंभ किये गए किंतु इसका वास्तविक उद्देश्य कुछ और ही था। यमन पर सऊदी अरब के हमलों में अबतक ग्यारह हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके अतिरिक्त यमन का सऊदी अरब ने परिवेष्टन कर रखा है जिसके कारण वहां पर आवश्यकता की मूलभूत वस्तुओं की कमी बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि यमन इस समय मानवीय संकट के साथ ही साथ गंभीर आर्थिक संकट का भी शिकार है।
यमन के बारे में राष्ट्रसंघ के विशेष दूत इस्माईल वलद शेख इस समय यमन के बारे में जो कूटनीतिक गतिविधियां कर रहे हैं उनका उद्देश्य, यमन के भगोड़े राष्ट्रपित को वैध दर्शाना और यमन के क़ानूनी प्रतिष्ठानों की गतिविधियाों को कमज़ोर करना है। कुछ जानकारों का कहना है कि यमन के लिए राष्ट्रसंघ के विशेष दूत की हालिया गतिविधियां यमन के विरुद्ध षडयंत्र का रूप धारण कर चुकी हैं क्योंकि उनका पूरा प्रयास यह है कि यमन के विरुद्ध सऊदी अरब की कार्यवाहियों पर पर्दा डाला जाए।
बहुत से राजनैतिक टीकाकारों का कहना है कि यमन संकट के बारे में संयुक्त राष्ट्रसंघ और उसके प्रतिनिधियों की कार्यवाहियां, प्रतिक्रियाएं और क्रियाकलाप इस बात को स्पष्ट करते हैं कि यह संगठन, निर्दोष जनता का साथ देने के बजाए अतिग्रहकारियों का पक्ष ले रहा है।