बहरैन में क्रांति की छठी वर्षगांठ पर व्यापक जन प्रदर्शन
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आले ख़लीफ़ा सरकार की ओर से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद बहरैन की जनता ने अपनी क्रांति की छठी वर्षगांठ पर पूरे देश में सरकार के विरुद्ध ज़बरदस्त प्रदर्शन किए।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Feb १४, २०१७ १३:४४ Asia/Kolkata

आले ख़लीफ़ा सरकार की ओर से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद बहरैन की जनता ने अपनी क्रांति की छठी वर्षगांठ पर पूरे देश में सरकार के विरुद्ध ज़बरदस्त प्रदर्शन किए।

छः साल पहले 14 फ़रवरी को ही बहरैन की जनता ने अत्याचारी व तानाशाही आले ख़लीफ़ा के ख़िलाफ़ अपना आंदोलन शुरू किया था। बहरैन के विभिन्न स्थानों पर मंगलवार को जनता ने प्रदर्शन करके सरकार की नीतियों पर अपना विरोध जताया और अपनी क़ानूनी मांगों को एक बार फिर दोहराया। प्रदर्शनकारियों ने आले ख़लीफ़ा सरकार के विरुद्ध नारे लगा कर अपने धार्मिक नेता शैख़ ईसा क़ासिम और राजनैतिक बंदियों से अपनी समरसता की घोषणा की। जनता के प्रदर्शन शांतिपूर्ण होने के बावजूद बहरैन की तानाशाही सरकार के सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर विषैली गैसों के गोले फेंके।  बहरैनी सैनिकों ने छर्रे वाली गोलियां भी फ़ायर कीं जिनसे अनेक प्रदर्शनकारी घायल हो गए।

मनामा का प्रख्यात पर्ल स्क्वायर जो अब ध्वस्त हो चुका है

 

बहरैन में कब और क्यों आरंभ हुआ जनांदोलन?

वर्ष 2010 के आरंभ और 2011 के आरंभ में जब अरब जगत में अत्याचारी, तानाशाही और बड़ी शक्तियों की पिट्ठू सरकारों के ख़िलाफ़ क्रांतियां आना शुरू हुईं तो बहरैन की जनता, भी जो बरसों से अपने मूल प्रजातांत्रिक अधिकारों से वंचित है, 14 फ़रवरी 2011 को सत्तारूढ़ आले ख़लीफ़ा शासन के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई। उस दिन को बहरैन के क्रांतिकारी युवाओं ने आक्रोश दिवस का नाम दिया था और सड़कों पर प्रदर्शन आरंभ कर दिया था। अन्य अरब देशों की तरह बहरैन का जनांदोलन भी सोशल मीडिया पर प्रचार और युवाओं के माध्यम से शुरू हुआ। 14 फ़रवरी सन 2011 को मुख्य प्रदर्शन राजधानी मनामा के पर्ल स्क्वायर पर हुआ जिसमें बाद में तानाशाही शासन ने क्रांति का स्मारक बनने से रोकने के लिए ध्वस्त कर दिया। बहरैन की जनता ने अपना आंदोलन करने के लिए 14 फ़रवरी की तारीख़ का चयन भी सोच समझ कर किया था। 2002 में इसी दिन बहरैन का संविधान पारित हुआ था।

 

बहरैनी जनता चाहती क्या है?

बहरैन की आबादी का लगभग 70 प्रतिशत भाग शिया मुसलमानों पर आधारित है और आले ख़लीफ़ा अल्प संख्यक सुन्नी मुसलमानों से संबंधित है। यह सरकार शियों के संबंध में अत्यंत भेदभावपूर्ण नीति अपनाए हुए है और इसी कारण देश की अधिकतर जनता उसकी विरोधी है। बहरैन की जनता की मुख्य मांग देश में प्रजातंत्र की स्थापना और भेदभाव की समाप्ति है लेकिन तानाशाही सरकार जनता को उसके अधिकार देने के लिए तैयार नहीं है। इस देश की सत्ता पर आले ख़लीफ़ा परिवार के लोगों का क़ब्ज़ा है जिन्हें सऊदी अरब, अमरीका, ब्रिटेन और अनेक अरब व पश्चिमी देशों का भरपूर समर्थन प्राप्त है। सऊदी अरब के सैनिक तो बहरैन में आले ख़लीफ़ा के सुरक्षा बलों के साथ मिल कर बहरैनी जनता का खुल कर दमन कर रहे हैं।

सरकार विरोधी प्रदर्शनों में महिलाएं भी बड़ी संख्या में भाग लेती हैं

आले ख़लीफ़ा शासन ने बहरैनी जनता के नेताओं और वरिष्ठ धर्मगुरुओं के साथ ही बड़ी संख्या में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को जेल में ठूंस रखा है। देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी शैख़ अली सलमान भी बहुत दिनों से जेल में हैं और आले ख़लीफ़ा की दिखावे की अदालत ने उन्हें कई बरस जेल की सज़ा सुना रखी है।

शैख़ अली सलमान

आले ख़लीफ़ा सरकार का एक और हथकंडा क्रांतिकारियों की नागरिकता छीनना है। बहरैन के शिया मुसलमानों के वरिष्ठ धर्मगुरू आयतुल्लाह शैख़ ईसा क़ासिम की नागरिकता भी छीन ली गई है और उन पर कई बार मुक़द्दमा चलाने की कोशिश की गई है लेकिन बहरैन के क्रांतिकारी लोग महीनों से उनके घर के सामने धरने पर बैठे हैं और सुरक्षा बलों को उन तक पहुंचने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। 

वरिष्ठ धर्मगुरू शैख़ ईसा क़ासिम और प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता नबील रजब

बहरैन के प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता नबील रजब, मरयम अलख़ाजा और अनेक अन्य भी कई बार गिरफ़्तार हो कर जेल जा चुके हैं। (HN)