संयुक्त अरब इमारात व इस्राईल के संबंधों का भांडा फूटा
संयुक्त अरब इमारात व इस्राईल के सहयोग के नए आयामों के सामने आने पर संचार माध्यमों में व्यापक प्रतिक्रियाएं जताई जा रही हैं और एक बार फिर पूरे संसार का ध्यान अमरीका की मध्यस्थता से ज़ायोनी शासन के साथ सांठ-गांठ करने वाले अरब राष्ट्राध्यक्षों के पर्दे के पीछे के संबंधों की ओर आकृष्ट हो गया है।
अमरीका में संयुक्त अरब इमारात के राजदूत यूसुफ़ उतैबा के ईमेल को हैक किए जाने के बाद जो दस्तावेज़ सामने आए हैं उनसे पता चलता है कि अबू ज़हबी और तेल अवीव के बीच गुप्त और मज़बूत संबंध हैं और अमरीका में डेमोक्रेसी की रक्षा की संस्था इन दोनों पक्षों के बीच समन्वय का काम कर रही है। अमरीकी व ज़ायोनी संस्थाओं के माध्यम से संयुक्त अरब इमारात और इस्राईल के संबंध हर दिन नए आयाम लेते जा रहे हैं और नौबत यहां तक पहुंच चुकी है कि दोनों पक्ष आर्थिक परियोजनाओं और सैन्य अभ्यासों में एक दूसरे से सहयोग कर रहे हैं और एक दूसरे के यहां यात्राएं कर रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में अबू ज़हबी, हालिया वर्षों में अरब जगत में ज़ायोनी शासन के एक अहम सुरक्षा, गुप्तचर और व्यापारिक केंद्र में बदल चुका है।
अरब देशों में अंतर्राष्ट्रीय बैठकों व कान्फ़्रेंसों में भाग लेने के बहाने इस्राईली प्रतिनिधि मंडलों की मेज़बानी, ज़ायोनी शासन के साथ अपने संबंध विस्तार के लिए संयुक्त अरब इमारात का एक हथकंडा रहा है। इस देश ने विभिन्न अवसरों पर एेसी स्थिति में इस्राईल के उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडलों की मेज़बानी की है जब फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ अत्याचारों में वृद्धि और विस्तारवादी नीतियों के चलते ज़ायोनी शासन विश्व स्तर पर अलग थलग पड़ चुका है। ज़ायोनी शासन के साथ संबंध स्थापित करना और उसे विस्तृत करना, इस्राईल के बहिष्कार की अरब लीग की नीति से पूरी तरह विरोधाभास रखता है। दूसरी ओर इस्राईल, अरब देशों की नीतियों को अपने हितों से समन्वित करके क्षेत्र में प्रतिरोध के मोर्चे को कमज़ोर करने और पूरे मध्यपूर्व पर वर्चस्व जमाने के लिए अरब देशों की संभावनाओं से लाभ उठाना चाहता है। (HN)