तुर्की की ईरानोफ़ोबिया के ज़रिए क़तर संकट हल करने की कोशिश
तुर्की की ईरानोफ़ोबिया के ज़रिए क़तर संकट हल करने की कोशिश
तुर्की के विदेश मंत्री मौलूद चाऊश ओग़लू ने एक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि अब तक क़तर के जितना किसी भी देश ने तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिल कर ईरान के मुक़ाबले में दृढ़ता नहीं दिखायी है।
तुर्क अधिकारी का यह हस्तक्षेपूर्ण बयान ऐसी हालत में सामने आया है कि इससे पहले तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान ने सऊदी अरब की चापलूसी में उसे क्षेत्र का बड़ा प्रभावी देश बताते हुए आले सऊद शासन से क़तर की नाकाबंदी ख़त्म करके क्षेत्र की शांति, सुरक्षा व स्थिरता में योगदान देने की अपील की थी।
तुर्की की सऊदी अरब की अगुवाई में कुछ अरब देशों की ओर से क़तर की नाकाबंदी के संकट को हल करने में अधिक भूमिका निभाने की कोशिश, उसकी क्षेत्र में शांति चाहने की इच्छा से ज़्यादा अर्दोग़ान की मुखिया बनने की ललक दो दर्शाती है जो एक संकट को हल करने के लिए एक मध्यस्थ के भेस में ज़ाहिर हुयी है।
लेकिन तुर्क विदेश मंत्री के इस बयान पर कि क़तर ईरान के साथ नहीं है, ध्यान देने की ज़रूरत है। हालांकि जून 2016 में तुर्की में सैन्य विद्रोह के बाद तुर्की की विदेश नीति में एक तरह की बौखलाहट साफ़ तौर पर नज़र आती है, लेकिन यह बौखलाहट अर्दोग़ान की क्षेत्र सहित इस्लामी जगत पर वर्चस्व जमाने की चाह और सऊदी अरब के साथ तुर्की की छिपी प्रतिस्पर्धा के अधीन लगती है।
तुर्की का सऊदी अरब के साथ होना और ईरान विरोधी मोर्चे को मज़बूत करने की कोशिश से सिर्फ़ तुर्की के हित ख़तरे में पड़ेंगे।
यद्यपि इससे पहले तुर्की की आतंकियों के लिए सीरिया हथियार भेजने की कार्यवाही और इस कार्यवाही का भांडा फोड़ने वाले पत्रकार को क़ैद करने से तुर्की की बड़ी बदनामी हुयी थी, लेकिन अब तुर्की ईरान पर आरोप लगा कर अपनी बिगड़ी छवि को सुधारने की कोशिश कर रहा है।
इन सब बातों के मद्देनज़र इन दिनों तुर्की के धार्मिक, नागरिक व राजनैतिक हल्कों की अंकारा के अपरिपक्व दृष्टिकोण को संतुलित करने की ज़रूरत पहले से ज़्यादा महसूस हो रही है। तुर्क अधिकारियों को मतभेद को हवा देने से दूर रहना और क्षेत्रीय राष्ट्रों के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए क़दम उठाना चाहिए। (MAQ/T)